शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

सूचना तथा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद

सूचना तथा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का उदय

पिछले दो दशको में विकसित पूंजीवादी देशो विशेष रूप से अमेरिका में कम्प्यूटर ,दूर संचार,इंटरनेट तथा मोबाईल फोन के तेज विकास ने सारी दुनिया में क्रन्तिकारी परिवर्तन किये हैं।’’सूचना टेक्नालाजी’’ ने आज सारी दुनिया को एक ’’ग्लोबल विलेज ’’ में बदल दिया है। युद्धो में इस टेक्नालाजी का इस्तेमाल विशेष रूप से मानव रहित ड्रोन विमानो ने युद्ध के सम्पूर्ण परिदृश्य को बदल दिया। बहुत से समाज शास्त्री इस स्थिति को ’’सूचना साम्राज्यवाद’’ तथा’’सांस्कृतिक वर्चस्व’’ का नाम भी दे रहे हैं । पश्चिमी जगत आज इस नयी तकनीकी के माध्यम से सारे विश्व में एक तरह की संस्कृति भाषा तथा विचार थोप रहा है। चैबीस घण्टे चलने वाले टी.वी. सारी दुनिया में उपभोक्तावाद को बढ़ावा दे रहे हैं । परन्तु सूचना तकनीकी का फायदा अगर सामा्राज्यवादी उठा रहे हैं तो सामाजिक परिवर्तन की ताकते भी इसका इस्तेमाल कर सकती हैं । पिछले वर्षो में लोकतंत्र की मांग को लेकर अरब जगत के आन्दोलनो में इंटरनेट तथा सूचना तकनीकी ने भारी योगदान दिया था।

आज के साम्राज्यवाद से संघर्ष की सम्भावना

आज की दुनिया का समग्र विशेषण करने से यह बात स्पष्ट तौर पर निकलती है कि लेनिन में 1916 में जिस साम्राज्यवाद की व्याख्या की थी उसका आर्थिक पक्ष आज भी सटीक तथा सही है। पूँजीवाद की इजारेदारी कई गुना ज्यादा बढ़ गयी है। ’’सामा्राज्यवाद आज एकल इकाई नही है।’’ वह गम्भीर अंतर्विरोधों से ग्रस्त है। निरन्तर तथा जल्दी -जल्दी आने वाली मंदी उसे और भी समस्याग्रस्त बना रही हैं । अर्थतंत्र से उपनिवेशवाद तथा सामंतवाद की पूर्ण विदाई हो रही है। पूँजी के साम्राज्य ने आज अपने आगोश में ले लिया है। पहले की सारी क्रांतियाँ चाहे वह रूस ,चीन ,एशिया तथा लैटिन अमेरिका में हुयी। वे पूँजीवाद के घोर आर्थिक ,राजनीतिक संबंधो के बीच सम्पन्न हुयी। परन्तु आज स्थितियां बदल गयी हैं तथा इसका सामना पूंजीवादी  देशो तथा जनतंत्रो से है जिसने इस मंजिल को और कठिन तथा जटिल को बना दिया है। बीती शताब्दी के सबक और रणनीतियां चाहे जितने भी महत्वपूर्ण हो अब सिर्फ उनसे काम नही चल सकता। अगली बड़ी क्रान्ति जहाँ भी सम्पन्न होगी वह पूँजीवादके खिलाफ प्रत्यक्ष पहली क्रान्ति होगी और किसी न किसी किस्म के बुर्जुआ जनतांत्रिक राज्य के खिलाफ होगी। 

लेनिन ने लिखा था साम्रज्यवाद का अर्थ युद्ध होता है। यह बात आज भी अपने आप में सत्य है। आज सारी दुनिया में बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय युद्ध तथा गृह युद्ध हो रहे हैं जो किसी भी विश्व युद्ध की तबाही व बर्बादी से कम नही हैं। सीरियाइराक लीबियाअफगानिस्तानयमन,तंजानिया ,सूडान आदि युद्ध तथा गृह युद्ध के इलाको से यूरोप में बढ़ती शरणार्थियों की समस्या में इसका स्पष्ट प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है। अमेरिका के नेतृत्व की आज की अति शोषक साम्राज्यवादी व्यवस्था ( जो आधे दर्जन दशो से ज्यादा मुल्कों में एक साथ सैन्य हस्ताक्षेप और ड्रोन युद्धो में उलझी हुयी है जो अपने विशाल नाभिकीय हथियारो को आधुनिक बनाने के लिए अगले दशक तक 200 अरब डालर खर्च करने की योजना बना रही है। ) द्वारा पैदा की गयी अस्थिरता आज कई तरह के युद्धो की सम्भावनाये पैदा कर रही है। यहा तक कि पर्यावरण में भी बदलाव मानव सभ्यता को अस्थिर होने तथा युद्धो की सम्भावनाओ को बढ़ाते है। यद्यपि केवल पर्यावरण परिवर्तन ही हमारी धरती तथा सभ्यता के विनाश का कारण बन सकता है। लेनिन के शब्दो में इन हालतो में वामपक्ष की यह जिम्मेदारी है वह ’’सिर्फ आर्थिक ही नही बल्कि राजनैतिक राष्ट्रीय इत्यादि अंतर्विरोधों ,संघर्षो और क्षोभ का भी’’ सामना करें जो लगातार हमारे समय की पहचान बनते जा रहे है। इसका मतलब जमीनी स्तर से एक ऐसे साहसपूर्ण वैश्विक आन्दोलन को बढ़ाना है जिसकी मुख्य चुनौती होगी उस साम्राज्यवाद को ध्वस्त करना जिसे हमारे समय के पूँजीवाद  की बुनियाद समझा जाता है।

1948 में मार्क्स-एंगेल्स द्वारा लिखित कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में भी मार्क्स ने अपने-अपने देश के पूंजीवादी निजाम के खिलाफ सर्वहारा वर्ग को संघर्ष छेड़ने की बात की थी जिसका उद्देश्य एक ज्यादा क्षैतिज ,समतावादी ,शान्तिपूर्ण और टिकाऊ सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करना है। जिसका नियंत्रण खुद सामूहिक उत्पादको के हाथ में होगा।

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