- मालवीय जी
शिक्षा जगत के परिवेश आज हर तरह से उपेक्षित हो रहे हैं। जहां सर्वोपरि गुणवत्ता होनी चाहिए वहां बची-खुची योग्यता, टैलेंट का प्रयोग हो रहा है। जिसका कहीं प्रयोग नहीं हो सका वह शिक्षा जगत में आ रहा है, जहां शिक्षा का धड़ल्ले से व्यापार हो रहा है | आज शिक्षा देने के नाम पर गली-गली निजी, सरकारी शिक्षा केन्द्र खुले तो मिल जायेंगे पर इनमें से अधिकांश के पास कुशल योग्य स्टाफ नहीं होने से शिक्षा के साथ जो खुला मजाक हो रहा है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता | भारी-भरकम रकम का खुला खेल शिक्षा केन्द्र स्थापना से लेकर संचालित होने तक यहां आसानी से देखा जा सकता है। जगह-जगह इस क्षेत्र में खुली दुकानदारियां इसका साक्षात उदाहरण दे रही हैं, जहां शिक्षा के वास्तविक मूल्य का कोई अर्थ नहीं | इस तरह की भूमिका में सरकार भी कहीं पीछे नहीं है जो बिना वास्तविक जांच किये ही शिक्षा का पट्टा गले में टांग कर वाहवाही लूट लेती है | एक सरकार मान्यता देती है तथा दूसरी सरकार उसे रद्द कर देती है | इस तरह के परिवेश में अर्थ कमाने की साफ-साफ प्रवृत्ति हावी देखी जा सकती है | जहां इस तरह के परिवेश के चलते आज यहां लाखों नौजवान प्रकाश पाने के मार्ग में अंधकारमय भविष्य के प्रति चिंतित हैं |
शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को उजागर करने के लिये हमें उस अवधारणा को फिर से कायम करना होगा, जहां गुरू एवं शिष्य के बीच बनी आदर्श परम्परा जीवन को साकार रूप देने में सफल सिध्द हो सके | शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता को नकारा जाना इसके मूल उद्देश्य को समाप्त करना है | इसलिये किसी भी कीमत पर इस दिशा में समझौता नहीं किया जाना चाहिए | गुरू को सर्वोपरि पद पर रखकर ही ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। तभी गुरु एवं शिष्य के बीच एक आदर्श परम्परा का निर्वाह हो सकेगा और यही परम्परा शिक्षा के मूल रूप को जीवन में उतारने में सहायक सिध्द होगी युवाओं में मूल्यों के जरिये श्रेष्ठ संस्कार और आदर्श शिक्षा की जरूरत है | आजकल के युवाओं में ज्ञान है परन्तु भौतिक ज्ञान के साथ आध्यात्मिक मूल्य एवं ज्ञान का अभाव होता जा रहा हैँ। इससे संस्कारविहिन मनुष्य का जीवन एक पशु के समान हो जाता है | मूल्य आधारित शिक्षा से युवाओं में श्रेष्ठ संस्कार बनेंगे |








