रविवार, 1 अप्रैल 2018

संपादन कला (प्रिंट माध्यम के संदर्भ में)

आलोक श्रीवास्तव
संपादक‚ अहा जिंदगी व दैनिक भास्कर मैगजीन डिवीजन

संपादन एक व्यापक शब्द है। अकसर हम संपादन का अर्थ समाचारों के संपादन से लेते हैं। पर संपादन अपने संपूर्ण अर्थों में पत्रकारिता के उस काम का सम्मिलित नाम है‚ जिसकी लंबी प्रक्रिया के बाद कोई समाचार‚ लेख‚ फीचर‚ साक्षात्कार आदि प्रकाशन और प्रसारण की स्थिति में पहुंचते हैं। संपादन कला को ठीक से समझने के लिए जरूरी है कि यह जान लिया जाए कि यह क्या नहीं है:
1. लिखित कॉपी को काट-छांट कर छोटा कर देना
2. लिखित कॉपी की भाषा बदल देना
3. लिखित कॉपी को संपूर्णतः रूपांतरित कर देना
4. लिखित कॉपी को हेडिंग व सबहेडिंग से सुसज्जित कर देना
5. लिखित कॉपी को अलंकृत कर देना
6. लिखित कॉपी को सरल बना देना या उसे कोई खास स्वरूप दे देना
7. लिखित कॉपी में तथ्यों को ठीक करना या तथ्यों का मूल्यांकन कर उन्हें घटा-बढ़ा देना
8. लिखित कॉपी को पाठकों के बौद्धिक या समझ के स्तर के अनुरूप बना देना
अब इस बिंदु पर यह बता देना जरूरी है कि किसी भी कॉपी के संपादन में यह सब किया जाता है। पर हर कॉपी में यह सब करने की गुंजाइश अलग होती है। उपरोक्त काम हर कॉपी में एक समान रूप से नहीं किया जा सकता‚ यदि ऐसा किया गया तो वह एक गलत संपादन का उदाहरण होगा। अच्छे संपादन के लिए चार बातों की परख बहुत जरूरी है:
1. दी गई कॉपी बिना किसी परिवर्तन के ज्यों की त्यों मुद्रण के लिए अग्रसारित हो। यह जरूरत तब पड़ती है, जब कोई कॉपी भाषा‚ विचार‚ तथ्य हर दृष्टि से मुकम्मल हो। परंतु होता यह है कि संपादन करने का अनुभव पा चुका व्यक्ति हर कॉपी को तब्दील करने और सुधारने के मोह से खुद को मुक्त नहीं कर पाता। यदि वह किसी कॉपी को बिना कोई निशान लगाए अग्रसारित करने का विवेक विकसित कर लेता है तो यह संपादन कला का एक बेहतर उदाहरण होगा। यहां यह बता देना जरूरी है कि ऐसी कॉपियां कम ही होती हैं। यह ठीक ऐसा ही है कि क्रिकेट में ऑफ स्टंप के बिल्कुल पास से निकलती अच्छी लेंथ और अच्छी लंबाई की बेहतरीन गेंद को छोड़ देने का कौशल अर्जित करना। बड़े से बड़े खिलाड़ी इसमें पूर्ण कुशल नहीं हो पाते। सुनील गावस्कर इस कला में अप्रतिम थे।
2. कॉपी में मामूली फेरबदल और सुधार कर उसे लगभग मुकम्मल बना देना।
3. कॉपी में बहुत अधिक परिर्वतन करना।
4. कॉपी को लगभग पूरी तरह से री-राइट करना।
इन चारों बातों को ठीक से समझ लेना जरूरी है। किसी भी अखबार या पत्रिका के पास बहुत सारे स्रोतों से लिखित कॉपी आती है। इनका अलग अलग स्तर होता है। उस स्तर और गुणवत्ता की ठीक पहचान कर पाना और उसके अनुरूप उस कॉपी के साथ ट्रीटमेंट करने का कौशल विकसित कर पाना ही बेहतर संपादन की ओर ले जाएगा। यह सब तो वे बातें हुईं जो संपादन को संभव बनाती हैं या उसे बेहतर बनाती हैं। पर यह करने के लिए जो तैयारी चाहिए वह महत्वपूर्ण है। इस तैयारी को भी समझने के लिए इन बिंदुओं में बांटा जा सकता है:
1. व्यापक अध्ययन व अभिरुचि: राजनीति‚ समाज‚ इतिहास‚ संस्कृति‚ सिनेमा‚ खेल‚ साहित्य आदि जीवन और समाज से जुड़ी ढेरों चीजों का अध्ययन करना और उनमें रुचि लेना ही बेहतर संपादन के लिए तैयार कर सकता है‚ यही वह कच्चा माल है‚ जिससे संपादन के कौशल को विकसित किया जाता है। इसे और सरल ढंग से समझ लें। कोई भी कॉपी किसी न किसी विषय से संबंधित होती है‚ वह कॉपी समाचार के रूप में हो या फीचर के रूप में आलेख के रूप में हो या साक्षात्मकार के रूप में। उस विषय की जानकारी ही यह बता पाएगी कि तथ्य कितने सही हैं‚ उनका विश्लेषण या प्रस्तुतीकरण कितना संगत है।
2. भाषा का समुचित ज्ञान: जिस भाषा में संपादन किया जाना है‚ उसके समुचित ज्ञान का मतलब है कि उसके विराम चिंहों‚ व्याकरण‚ वाक्यरचना‚ मुहावरों‚ शब्द-संपदा‚ अभिव्यक्ति शैली तथा भाषा व संप्रेषण के विविध रूपों व स्तरों का ठीक ज्ञान‚ अनुभव और अभ्यास ही वह दक्षता विकसित कर सकता है कि अच्छा संपादन किया जा सके
3. विधा की समझ: समाचार‚ फीचर‚ आलेख‚ इंटरव्यू ऐसी ही अनेक विधाएं या रूप हैं जिनमें पत्रकारिता संबंधी लेखन होता है‚ हर विधा की अपनी विशिष्टता है। कोई समाचार आलेख की तरह नहीं लिखा जा सकता‚ न ही कोई फीचर समाचार की शैली में लिखा जा सकता है। विधा की जरूरत के अनुसार कॉपी होनी चाहिए। यदि नहीं है तो कितने और किस तरह के परिवर्तन से वह वैसी हो सकती है‚ यह समझ होनी चाहिए।
4. प्रस्तुति का विवेक: इसमें हेडिंग‚ सबहेडिंग लगाना‚ पैराग्राफस में कॉपी को बांटना‚ कौन सा पैरा पहले आना चाहिए कौन सा बाद में‚ कौन से वाक्य पहले आने चाहिए कौन से बाद में‚ शब्दों‚ वाक्यों‚ पैरा का परस्पर संबद्ध होना। इंट्रो‚ हाइलाइटर‚ कैप्शन आदि से कॉपी को सज्जित करना‚ और आकर्षक बनाना यह आज बहुत महत्व रखता है। यह सारा काम भी विधा के अनुरूप होना चाहिए‚ यानी समाचार‚ फीचर‚ आलेख…. आदि की प्रस्तुति में भिन्नता होगी‚ फिर यह प्रस्तुति अखबार‚ पत्रिका आदि के अपने विशिष्ट स्वरूप और पाठक वर्ग के अनुसार होगी। संपादन के लिए सबसे जरूरी चीज है – अभिरुचि का विकास। यह अभिरुचि भाषा, कंटेंट‚ विचार‚ समाज‚ पत्रकारिता के विविध माध्यम और विधा के अनेक रूपों में में गतिशील होनी चाहिए। अखबारों‚ पत्रिकाओं आदि का अपना एक इतिहास है‚ इसी प्रकार पाठक वर्ग का भी अपना एक इतिहास है यह इतिहास विकास के अनेक दौरों से गुजरा है‚ जिसने आज के पत्रकारिता माध्यमों और पाठक वर्ग को इनका वर्तमान स्वरूप दिया है। इस विकास की समझ संपादन कौशल को परिमार्जित और अपडेट करती है। साफ है कि आज के किसी अखबार के समाचार की भाषा और प्रस्तुति देखें तो यह 30-40 पहले की भाषा और प्रस्तुति से बिल्कुल अलग होगी। इसी प्रकार यह भी पता चलता है कि आज समाचारों का दायरा बढ़ा है। ढेरों नए विषय और नए क्षेत्र पैदा हुए हैं। पाठकों की अभिरुचि और जागरूकता का स्तर भी बढ़ा है। उनका एक्सपोजर बढ़ा है। रेडियो‚ टीवी‚ इंटरनेट‚ साप्ताहिक‚ मासिक‚ दैनिक विविध तरह के माध्यम और उनकी पहुंच बढ़ी है। अब ऐसा नहीं हो सकता है कि सुबह के अखबार में ही जो समाचार छपा है‚ वह अगले दिन के बुलेटिन में रेडियो पर पढ़ा जाए‚ जबकि ऐसा बरसों पहले यदाकदा होता ही था। यानी समय‚ माध्यम‚ पाठक इनकी गहरी समझ ही सामग्री चयन को अपडेट रखने‚ उसका उचित संयोजन करने और उसे बेहतर ढंग से सुसंपादित रूप में प्रस्तुत करने में मदद कर सकती है। आज कॉपी के साथ‚ ग्रॉफिक्स‚ डाटा‚ विजुअल‚ चार्ट आदि का महत्व बहुत बढ़ा है। संपादन में इनका बेहतर इस्तेमाल अखबारों-पत्रिकाओं को ज्यादा आकर्षक और उपयोगी बनाता है।
संपादन के निम्नलिखित चरण माने जा सकते हैं –
1. सामग्री चयन व सामग्री विश्लेषण
2. सामग्री का भाषा संपादन
3. प्रस्तुतिकरण
ये तीनों काम परस्पर संबद्ध हैं‚ और इनमें बेहतर तालमेल से ही बेहतर संपादन कार्य किया जा सकता है। एक अन्य बात जो गुजारे जमाने की पत्रकारिता में महत्वपूर्ण मानी जाती थी‚ परंतु अब इसका चलन कम हो गया है‚ वह है वैचारिक रुझान। संपादन का यह जरूरी हिस्सा हुआ करता था। अब पत्रकारिता के बदले दौर में यह माना जाता है कि बेहतर अखबार या पत्रिका के लिए वैचारिक रुझान बाधक है। हालांकि इसका असर यह पड़ा है कि वैचारिक रुझान से रहित संपादन में भी अदृश्य और बारी वैचारिक रुझान होते ही हैं। ये वैचारिक रुझान प्रभुत्वशाली विचारधाराओं से बने वर्तमान के सामूहिक अवचेतन के रूप में होते हैं। कुल मिलाकर हुआ यह है कि सजग वैचारिकता अब नेपथ्य में है। इसका परिणाम वर्तमान पत्रकारिता के शिल्प और प्रस्तुतिकरण को निखारने और उसे विचाररहित बनाने की ओर बढ़ा है। कंटेंट के स्तर पर यह अच्छे संपादन में मदद नहीं करता। अच्छे संपादन के लिए यह कौशल भी बहुत जरूरी है कि अपने विचारों‚ उनके स्रोतों और उनके निर्माण की प्रक्रिया के बारे में सजगता हो।

मंगलवार, 27 मार्च 2018

पत्रकारिता की आचार संहिता

पत्रकारिता की आचार संहिता का रखें ध्यान-
1. पत्रकार को किसी भी विचारधारा से प्रभावित होकर खबर का प्रकाशनया प्रसारण नहीं करना चाहिए। पत्रकार को हर समय न्यायनिष्ट और निष्पक्ष रहना चाहिए।
2. हमारे देश में जाति और धर्म के नाम पर हमेशा विवाद होता रहता है, कई बार तो दंगा की भी नौबत आ जाती है। अत: एक पत्रकारको खबर का प्रकाशन और प्रसारण करते समय समय विशेष सावधानी और निष्पक्षता बरती जाये। किसी भी प्रकार से जाति या धर्म को लेकर टिका-टिप्पणी नहीं करना चाहिए।
3. खबर की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। खबर जो है ठीक वैसे ही पेश करना चाहिए। समाचारों में तथ्यों को तोडा मरोड़ा न जाये न कोई सूचना छिपायी जाये।
4. व्यावसायिक गोपनीयता का निष्ठा से अनुपालन का ध्यान रखना चाहिए।
5. पत्रकारिता एक मिशन है अत: इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत हित साधने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। प्राय: कई एेसे पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान पत्रकारिता को ढाल बनाकर उसके आड़ में गलत धंधा करते हैं। खुद को पत्रकार बताकर नियम-कानून की अवहेलना करना या मनमानी करना भी अपराध की श्रेणी में आता है।
6. पत्रकार अपने पद और पहुंच का उपयोग गैर पत्रकारीय कार्यों के लिए न करें। उदाहरण के लिए- प्राय: ऐसा देखा जाता है कि कई बार ट्रैफिक नियम का पालन ना करने पर जब पत्रकार को दंडित किया जाता है तो वह खुद को प्रेस से बताकर अपने पद का दुरुपयोग करता है।
7. पत्रकारिता पर कई बार पेड न्यूज जैसे दाग लग चुके हैं। अत: पत्रकारिता की मर्यादा का ध्यान रखते हुए एक पत्रकार को रिश्वत लेकर समाचार छापना या न छापना अवांछनीय, अमर्यादित और अनैतिक है।
8. हर व्यक्ति की इज्जत उसकी निजी संपत्ति होती है। जिसपर सिर्फ उसी व्यक्ति का अधिकार होता है किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अफवाह फैलाने के लिए पत्रकारिता का उपयोग नहीं किया जाये। यह पत्रकारिता की मर्यादा के खिलाफ है। अगर ऐसा समाचार छापने के लिए जनदबाव हो तो भी पत्रकार पर्याप्त संतुलित रहे।
कुछ साल पहले राष्ट्रपति एपीजे अव्दुल कलाम के हस्ताक्षर से एडीटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने एक पत्रकार व्यवहार संहिता भी जारी की थी। इसमें भी काफी मनन के बाद कई बिंदुओं को शामिल किया गया था। कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हैं-
1. पर्याप्त समय सीमा के तहत पीड़ित पक्ष को अपना जवाब देने या खंडन करने का मौका दें।
2. किसी व्यक्ति के निजी मामले को अनावश्यक प्रचार देने से बचें।
3. किसी खबर में लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए उसमें अतिश्योक्ती से बचें।
4. निजी दुख वाले दृश्यों से संबंधित खबरों को मानवीय हित के नाम पर आंख मूंद कर न परोसा जाये।मानवाधिकार और निजी भावनाओं की गोपनीयता का भी उतना ही महत्व है।
5. धार्मिक विवादों पर लिखते समय सभी संप्रदायों और समुदायों को समान आदर दिया जाना चाहिए।
6. अपराध मामलो में विशेषकर सेक्स और बच्चों से संबंधित मामले में यह देखना जरूरी है कि कहीं रिपोर्ट ही अपने आप में सजा न बन जाये और किसी जीवन को अनावश्यक बर्बाद न कर दे।
7. चोरी छिपे सुनकर (और फोटो लेकर) किसी यंत्र का सहारा लेकर ,किसी के निजी टेलीफोन पर बातचीत को पकड़ कर ,अपनी पहचान छिपा कर या चालबाजी से सूचनाएं प्राप्त नहीं की जायें। सिर्फ जनहित के मामले में ही जब ऐसा करना उचित है और सूचना प्राप्त करने का कोई और विकल्प न बचा हो तो ऐसा किया जाये।
कुछ ऐसी बातें हैं जिससे पत्रकार को फिल्ड में या डेस्क पर काम करते वक्त हमेशा दो-चार होना पड़ता है, इसलिए उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रखने के साथ-साथ एक पत्रकार को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि-
1. खबर, विजुअल या ग्राफिक्स में रेप पीड़िता का नाम, फोटो या किसी तरह का कोई पहचान ना हो, फोटो को ब्लर करवाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
2. न्यायालय को इस देश में सर्वश्रेष्ठ माना गया है इसलिए न्यायालय की अवहेलना नहीं होनी चाहिए।
3. देश हित एक पत्रकार की प्राथमिकता होती है अत: पत्रकार को देश के रक्षा और विदेश नीति के मामले में कवरेज करते वक्त देश की मर्यादा का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
4. न्यायालय जब तक किसी का अपराध ना सिद्ध कर दे उसे अपराधी नहीं कहना चाहिए इसलिए खबर में उसके लिए आरोपी शब्द का इस्तेमाल करें।
5. अगर कोई नाबालिग अपराध करता है तो उस आरोपी का विजुअल ब्लर करके ही चलाना चाहिए।
पत्रकारिता की आचार संहिता
पत्रकारिता की आचार संहिता
·        समाचार देते समय पत्रकार न्यायनिष्ट रहें।
·        जातीय, धार्मिक और आर्थिक मामलों पर लिखते समय विशेष सावधानी और निष्पक्षता बरती जाये
·        समाचारों में तथ्यों को तोडा मरोड़ा न जाये न कोई सूचना छिपायी जाये।
·        व्यावसायिक गोपनीयता का निष्ठा से अनुपालन
·        पत्रकारिता के माध्यम से व्यक्तिगत हितों का पोषण न करें।
·        पत्रकार अपने पद और पहुंच का उपयोग गैर पत्रकारीय कार्यो के लिए न करें।
·        रिश्वत लेकर समाचार छापना या न छापना अवांछनीय, अमर्यादित और अनैतिक है।
·        किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में अफवाह फैलाने के लिए पत्रकारिता का उपयोग नहीं किया जाये। यह पत्रकारिता की मर्यादा के खिलाफ है। अगर ऐसा समाचार छापने के लिए जनदबाव हो तो भी पत्रकार पर्याप्त संतुलित रहे।
कुछ साल पहले राष्ट्रपति एपीजे अव्दुल कलाम के हस्ताक्षर से एडीटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने एक पत्रकार व्यवहार संहिता भी जारी की थी। इसमें भी काफी मनन के बाद कई बिंदुओं को शामिल किया गया था। कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हैं-
·        पर्याप्त समय सीमा के तहत पीड़ित पक्ष को अपना जवाब देने या खंडन करने का मौका दें।
·        किसी व्यक्ति के निजी मामले को अनावश्यक प्रचार देने से बचें।
·        किसी खबर में लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए उसमें अतिश्योक्ती से बचें।
·        निजी दुख वाले दृश्यों से संबंधित खबरों को मानवीय हित के नाम पर आंख मूंद कर न परोसा जाये।मानवाधिकार और निजी भावनाओं की गोपनीयता का भी उतना ही महत्व है।
·        धार्मिक विवादों पर लिखते समय सभी संप्रदायों और समुदायों को समान आदर दिया जाना चाहिए।
·        अपराध मामलो में विशेषकर सेक्स और बच्चों से संबंधित मामले में यह देखना जरूरी है कि कहीं रिपोर्ट ही अपने आप में सजा न बन जाये और किसी जीवन को अनावश्यक बर्बाद न कर दे।

·        चोरी छिपे सुनकर (और फोटो लेकर) किसी यंत्र का सहारा लेकर ,किसी के निजी टेलीफोन पर बातचीत को पकड़ कर ,अपनी पहचान छिपा कर या चालबाजी से सूचनाएं प्राप्त नहीं की जायें। सिर्फ जनहित के मामले में ही जब ऐसा करना उचित है और सूचना प्राप्त करने का कोई और विकल्प न बचा हो तो ऐसा किया जाये।

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था और सूचना राजनीति
अवधेश कुमार यादव


प्रजातांत्रिक देशों में सत्ता का संचालन संवैधानिक प्रावधानों के तहत होता है। इन्हीं प्रावधानों के अनुरूप नागरिक आचरण करते हैं तथा संचार माध्यम संदेशों का सम्प्रेषण। संचार माध्यमों पर राष्ट्रों की अस्मिता भी निर्भर है, क्योंकि इनमें दो देशों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध को बनाने, बनाये रखने और बिगाड़ने की क्षमता होती है। आधुनिक संचार माध्यम तकनीक आधारित है। इस आधार पर सम्पूर्ण विश्व को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। पहला- उन्नत संचार तकनीक वाले देश, जो सूचना राजनीति के तहत साम्राज्यवाद के विस्तार में लगे हैं, और दूसरा- अल्पविकसित संचार तकनीक वाले देश, जो अपने सीमित संसाधनों के बल पर सूचना राजनीति और साम्राज्यवाद के विरोधी हैं। उपरोक्त विभाजन के आधार पर कहा जा सकता है कि विश्व वर्तमान समय में भी दो गुटों में विभाजित है। यह बात अलग है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के तत्काल बाद का विभाजन राजनीतिक था तथा वर्तमान विभाजन संचार तकनीक पर आधारित है।


अंतर्राष्ट्रीय संचार : अंतर्राष्ट्रीय संचार की अवधारणा का सम्बन्ध मानव सभ्यता के साथ जुड़ा हुआ है,क्योंकि मानव जैसे-जैसे विकास की ओर अग्रसर होता गया, वैसे-वैसे अन्य देशों की सूचनाओं और सांस्कृतियों गतिविधियों के संदर्भ में जानने का प्रयत्न करने लगा। परिणामतः अंतर्राष्ट्रीय संचार की अवधारणा का सूत्रपात हुआ। सभ्यता के विकास के प्रारंभिक युग में 'देशाटन' एक मात्र अंतर्राष्ट्रीय संचार का माध्यम था, जिसके तहत एक देश के नागरिक समूह बनाकर जल-थल मार्ग से दूसरे देश का भ्रमण करते थे तथा वहां के नागरिकों से मिलकर एक-दूसरे की सांस्कृतिक गतिविधियों से परिचित होते थे। इसके बाद, स्वदेश लौटकर अपने समाज के लोगों को यात्रा-वृतांत सुनाते तथा दूसरे देशों की संस्कृति के बारे में जानकारी देते थे।

अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में तकनीकी का उपयोग18वीं शताब्दी में सर्वप्रथम ब्रिटेन ने अपने विदेशी उपनिवेशों में सत्ता पर शासकीय नियंत्रण बनाये रखने के लिए किया। इसके लिए सम्रुद्री केबल लाइन की सहायता से संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता था। हालांकि, इसमें सामान्य जनों की सहभागिता नहीं होती थी। सामान्य जन 'देशाटन' के माध्यम से ही अंतर्राष्ट्रीय संचार का कार्य करते थे। बाद में मुद्रण तकनीक के उद्भव व विकास के बाद पुस्तकों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय संचार का कार्य किया जाने लगा।

अंतर्राष्ट्रीय संचार और समाचार समिति: प्रिण्ट माध्यमों के विकास के बाद अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं का उपयोग किया जाने लगा। बंदरगाहों पर नियुक्त संवाददाता नाविकों और यात्रियों से वार्तालाप कर अंतर्राष्ट्रीय समाचारों का संकलन करते थेे। ऐसे समाचारों में निष्पक्षता व प्रमाणिकता का अभाव था, जिसके चलते एक निश्चित स्थान पर विश्वसनीय स्रोतों से समाचारों के संकलन और प्रकाशन के लिए उपलब्ध कराने की आवश्यकता महसूस की गई, जिसके चलते समाचार समिति (News Agency)  की परिकल्पना का जन्म हुआ। फ्रांसीसी नागरिक चाल्र्स आवास को आधुनिक समाचार समिति का जनक कहा जाता है, जिसने सन् 1825 में 'न्यूज ब्यूरो' नामक दुनिया की पहली समाचार समिति स्थापित की तथा समाचार संकलन के लिए यूरोपीय देशों की राजधानियों में संवाददाता नियुक्त किया। प्रारंभ में आवास अपने ग्राहकों तक विशेष वाहक या डाक विभाग की सहायता से देश-दुनिया के समाचारों को उपलब्ध कराया। बाद में, इस कार्य के लिए तार का उपयोग करने लगा। सन् 1840 में आवास ने प्रायोगिक तौर पर पेरिस, लंदन एवं ब्रुसेल्स के बीच कबूतरों के माध्यम से समाचार भेजने का कार्य प्रारंभ किया, जो अंतर्राष्ट्रीय संचार का अनोखा उदाहरण है। इससे 'न्यूज ब्यूरो' को अत्यधिक लोकप्रियता मिली। सन् 1848 में चाल्र्स आवास ने 6 से10 किलोमीटर की दूरी पर टाॅवर बनाकर टेलीस्कोपी की सहायता से समाचारों को भेजना प्रारंभ किया। इसी साल टेलीग्राफ से समाचार भेजने की प्रणाली विकसित हुई। सन् 1849 में आवास के दो कर्मचारियों ने स्वतंत्र रूप से समाचार समिति का गठन किया। इनमें पहला था- बर्नार्ड वोल्फ, जिसने‘वोल्फ’ नामक समाचार समिति शुरू की। हालांकि, बर्नार्ड वोल्फ ने एक साल पहले ही प्रायोगिक तौर पर बर्लिन से ‘नेशनल जीतंुग’ शीर्षक से स्टॉक एक्सचेंज का भाव देना प्रारंभ कर दिया था। दूसरा था- जर्मनी का जुलियस रायटर था, जिसने 'रायटर' नामक समाचार समिति का गठन किया। जुलियस रायटर की समाचार समिति ने समाचार संकलन और वितरण के लिए डाकतार एवं रेलवे का भरपूर उपयोग किया।

समाचार समिति का उद्भव भले ही यूरोपीय देशों में हुआ, लेकिन इसके प्रभाव से अमेरिका अछूता नहीं रहा। सन् 1848 में न्यूयार्क के कुछ समाचार-पत्रों ने मिलकर 'हार्बर न्यूज एसोसिएशन' नामक समाचार समिति का गठन हुआ, जो नौकाओं के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय समाचार प्रेषित करती थी। सन् 1850 में 'जनरल न्यूज एसोसिएशन' का गठन हुआ। सन् 1857 में दोनों का 'नेशनल न्यूयार्क एसोसिएटेड प्रेस' के रूप में विलय हो गया। इस समिति ने यूरोप के समाचारों के लिए 'आवास' और'रायटर' के साथ व्यापारिक समझौता किया, जो अंतर्राष्ट्रीय संचार के विकास का उदाहरण है। हालांकि यह समझौता लम्बे समय तक चल नहीं सका। इसी दौरान एक नई समाचार समिति 'यूनाइटेड प्रेस एसोसिएशन' का गठन हुआ, जिसका सन् 1909 में 'यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल' नामक एक नई समाचार समिति में विलय हो गया। यूरोप की तीनों समाचार समितियों- 'आवास', 'वोल्फ' व 'रायटर' ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने का निर्णय लिया। इससे अंतर्राष्ट्रीय संचार माध्यम के रूप में समाचार समिति का विकास व विस्तार को गति मिली।

अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह : द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के बाद का विश्व राजनीतिक आधार पर दो गुटो में विभाजित था। एक गुट का साम्राज्यवादी अमेरिका तथा दूसरे गुट का साम्यवादी सोवियत संघ नेतृत्व करने लगा। इनके बीच भारत जैसे कुछ तीसरी दुनिया के विकासशील देश थे, जो धीरे-धीरे विदेशी उपनिवेश से स्वतंत्र हो रहे थे। इनमें अधिकांश देश कमजोर आर्थिक स्थिति वाले थे,जिनकी न तो अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह में कोई योगदान था और न तो इसके महत्व को समझ पा रहे थे। अमेरिकी विदेश मंत्री 'विलियम वेन्स' ने विकसित देशों के हित में अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह पर जोर दिया। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का उपयोग भी किया।

इस प्रकार, अमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का अंतर्राष्ट्रीय सूचना-प्रवाह पर एकाधिकार और मजबूत हो गया। विकसित देश अपनी समाचार समितियों के माध्यम से जैसा चाहते थे, वैसी सूचना दुनिया को उपलब्ध कराने लगे। एक तरफा प्रवाह के कारण विकसित देशों की सूचनाओं को विकासशील देश ज्यों का त्यों स्वीकार करने को विवश थे। पश्चिमी देशों की समाचार समितियों द्वारा सम्प्रेषित सूचनाएं विकासशील देशों के अनुरूप नहीं होती थी। इन सूचनाओं में विकासशील देशों के नकारात्मक पक्ष को प्रमुखता से तथा सकारात्मक पक्ष को दबाकर या विकृत रूप में प्रचारित किया जाता था। विकसित देशों की सूचना राजनीति को तीसरी दुनिया के विकासशील देश शीघ्र ही समझ गए और अंतर्राष्ट्रीय मंचों के माध्यम से भनई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था्य की मांग करने लगे।

नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) :  अंतर्राष्ट्रीय संचार के इतिहास की पड़ताल से पता चलता है कि नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था की मांग का प्रमुख कारण विकसित देशों द्वारा असंतुलित सूचना प्रवाह था। इसके अलावा भी कई अन्य थे, जिसके चलते तीसरी दुनिया के विकासशील देश पहली दुनिया के विकसित देशों के खिलाफ लामबन्द होने लगे। यथा-
1.         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद छोटे-छोटे साम्राज्यों के टूटने से नये देशों का अभ्युदय।
2.         पश्चिमी के औद्योगिक व विकसित देशों का नये देशों के साथ सम्बन्ध, जिससे पश्चिमी देशों का आर्थिक और राजनैतिक प्रभाव का लगातार बढ़ना।
3.         यू.एस. और यू.एस.एस.आर. के आक्रामक प्रभाव से परेशान होकर नये देशों का गुटनिरपेक्ष देशों के साथ जुड़ना।
4.         अंतर्राष्ट्रीय संगठनों- यू.एन.ओ. और यूनेस्को में विकसित देशों का वर्चस्व।

इस मुद्दे को विकासशील देशों ने गुट निरपेक्ष आंदोलन (G-77), संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) तथा संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रमुखता से उठाया। अल्जीरिया में आयोजित (5-9 सितम्बर, 1975) गुट निरपेक्ष देशों के चतुर्थ सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय संचार को बढ़ावा देने के लिए नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) की मांग की गई। इस सम्मेलन में 75 सदस्य देश तथा 24 पर्यवेक्षक देश और तीन अतिथि देश सम्मलित हुए थे। इस मुद्दे पर सन् 1976 में ट्यनिस एवं कोलम्बो सम्मेलन में भी विचार-विमर्श किया गया।

अंतर्राष्ट्रीय संचार व्यवस्था पर आधारित विचार-विमर्श का प्रमुख केन्द्र होने के कारण यूनेस्को नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (न्यूको) की स्थापना के लिए प्रयास किया। इसके लिए मैकब्राइड आयोग का गठन और सम्मेलन का आयोजन किया। सन् 1980 में यूनेस्को के सामान्य अधिवेशन में नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों का निर्धारित किया:-

1.     वर्तमान संचार व्यवस्था में व्याप्त असंतुलन को समाप्त करना।
2.   एकाधिकारी, सार्वजनिक, निजी और अति केन्द्रीकृत व्यवस्था के नकारात्मक प्रभाव को समाप्त करना।
3.   विचारों एवं सूचनाओं के स्वतंत्र प्रवाह एवं विस्तारीकरण के मार्ग में आने वाली आन्तरिक एवं वाह्य बाधाओं को दूर करना।
4.   सूचना के साधनों एवं माध्यमों की संख्या में बढ़ोत्तरी करना।
5.   सूचना एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
6.   पत्रकारों एवं जनमाध्यमों से जुड़े लोगों की उत्तरदायित्वपूर्ण स्वतंत्रता सुनिश्चित करना।
7.   विकासशील देशों को उनकी क्षमता के अनुरूप उपकरण व प्रशिक्षण में वृद्धि करना और आधारभूत सुविधाओं, आवश्यकताओं एवं उद्देश्यों के अनुरूप् संचार व्यवस्था का विकास करना।
8.     विकसित देशों में इन उद्देश्यों की प्राप्ति में सहयोग करने की भावना जागृत करना।
9.     एक दूसरे की सांस्कृतिक पहचान और प्रत्येक देश को अपने व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक हित के बारे में विश्व को सूचित करने के अधिकार का सम्मान करना।
10.   सूचना के अंतर्राष्ट्रीय आदान-प्रदान के संदर्भ में वैयक्तिक अधिकारों का सम्मान करना।
11.   प्रत्येक व्यक्ति की सूचना एवं संचार व्यवस्था में सहभागिता के अधिकार का सम्मान करना।

नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था ही तीसरी दुनिया के देशों के विकास का प्रमुख साधन है। इसके लिए विकासशील देश लगातार प्रयत्नशील हैं।

मैकब्राइड आयोग : यूनेस्को ने सन् 1977 में एक अंतर्राष्ट्रीय आयोग का गठन किया, जिसके अध्यक्ष आयरलैण्ड के पूर्व विदेशमंत्री सीयेन मैकब्राइड थे। इस आयोग में कनाडा के विश्व विख्यात संचारविद् मार्शल मैकलुहान के अलावा मिचियो नगाई, मुस्तफा मसमूदी, मोक्तर लूविस, एल्बे मा एकेंजो समेत कुल 15 संचार विशेषज्ञ, शिक्षाविद्, पत्रकारिता एवं प्रसारण विशेषज्ञों को सदस्य बनाया गया था। मैकब्राइड आयोग ने नई अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में विकासशील देशों की आवश्यकता को केन्द्र में रखकर सूचना के मुक्त एवं संतुलित प्रवाह की समस्या का अध्ययन किया तथा 82 महत्वपूर्ण सुझाव दिये। अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद मैकब्राइड आयोग स्वतः समाप्त हो गया।

सन् 1980 में मैकब्राइड आयोग ने 'दुनिया एक - विचार अनेक' (Many Voices One world) शीर्षक से अपनी अध्ययन रिपोर्ट प्रस्तुत किया, जिसमें पश्चिमी देशों के संचार माध्यमों के साम्राज्यवादी एवं एकाधिकारवादी प्रभुत्व पर चिन्ता व्यक्त की गई थी। इस रिपोर्ट में यूनेस्को ने बेलग्रेड सम्मेलन में प्रस्तुत किया। इस दौरान पश्चिम के विकसित देशों ने मैकब्राइड आयोग के सुझावों को मानने से इंकार कर दिया। मैकब्राइड आयोग का सुझाव था कि- 'संचार माध्यमों का सामाजिक या आर्थिक नीति के औजार के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए।' जबकि पश्चिमी देशों का तर्क था कि- 'संचार माध्यमों को अपने उद्देश्य का निर्धारण और क्रियान्वयन के मापदण्डों का स्वयं निर्धारित करना चाहिए, न कि सरकारों या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को।'

बेलग्रेड बैठक में जिन प्रस्तावों को स्वीकृति मिली, उनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सभी सदस्य देशों से आह्वान किया गया कि वे अपनी राष्ट्रीय संचार क्षमताओं का विकास करें और विचार,अभिव्यक्ति एवं सूचना की स्वतंत्रता की रक्षा की मूल आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए संचार के विकास की रणनीति का हिस्सा बनाये। साथ ही यूनेस्कों से अपेक्षा की गई कि वह सूचना और संचार के नए क्षेत्र में समस्याओं की पहचान करने तथा उनके समाधान में निर्णायक भूमिका का निर्वाह करें। इसके बावजूद किसी प्रकार का अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का निर्णय नहीं लिया। अंतर्राष्ट्रीय संचार एवं सूचना प्रवाह के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय कानून बनाने का सबसे पहले अमेरिका ने विरोध किया और वह यूनेस्को से अलग हो गया। बाद में ब्रिटेन ने भी अमेरिका की राह पर चलना प्रारंभ कर दिया और वह भी अलग हो गया।

गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल : जुलाई 1976 में गुट निरपेक्ष देशों का सम्मेलन नई दिल्ली में हुआ, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय संचार के दौरान असंतुलित सूचना प्रवाह पर चिन्ता व्यक्त की गई तथा गहन विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव पारित कर नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था के तहत गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल का गठन किया गया। इसके तहत गुट निरपेक्ष देशों की समाचार समितियों के बीच समाचारों के आदान-प्रदान की व्यवस्था की गई। इस पूल का भारत सन् 1976 से1979 तक प्रथम संस्थापन अध्यक्ष बना। इसका कार्य क्षेत्र विश्व के चारों महाद्वीपों- एशिया, पूर्वी यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक फैला हुआ है। गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल के माध्यम से चार भाषाओं- अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिष और अरबी में समाचारों का आदान-प्रदान किया जाने लगा।

पूल की गतिविधियों को संचालन एक निर्वाचित संस्था के द्वारा किया जाता है, जिसे समन्वय समिति भी कहा जाता है। पूल की अध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है। समन्वय समिति के सदस्यों का चयन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, निरंतरता, सक्रिय सहभागिता और क्रम के आधार पर किया जाता है। भारत में न्यूज पूल डेस्क संचालन भप्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया्य ;च्ण्ज्ण्प्ण्द्ध द्वारा किया जाता है।

भारत की भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्न में नई विश्व सूचना एवं संचार व्यवस्था (NWICO) की स्थापना और विकास में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, क्योंकि भारत न्यूको की लक्ष्य प्राप्ति और सिद्धान्तों के पुनः निर्माण, रक्षा और आगे बढ़ाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। सन्1978 में आयोजित यूनेस्कों के 20वीं सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि मण्डल ने श्रीलंका के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर पूरब-पश्चिम देशों के तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उल्लेख जनसंचार माध्यम घोषणा में भी किया गया है। नई विश्व सूचना एंव संचार व्यवस्था के लक्ष्य अन्तर्राष्ट्रीय संचार में सामन्जस्य स्थापित करने के लिए सूचना के संतुलित प्रवाह की व्यवस्था करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भारत की अगुवाई में गुट निरपेक्ष समाचार समिति पूल का गठन किया गया। इसके अलावा, भारत सरकार द्वारा विकासशील देशों के प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण के उद्देश्य से नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान में कई प्रकार के कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है।

निष्कर्ष : उपरोक्त प्रयासों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय संचार के क्षेत्र में विकसित देशों का वर्चस्व कायम है। इसका ज्वलन्त उदाहरण खाड़ी और अफगानिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिकी संचार माध्यमों द्वारा प्रसारित भ्रामक सूचना। युद्ध से जुड़ी वास्तविक सूचना को प्रसारित कर भअलजजीरा्य ने अमेरिकी संचार माध्यमों को बेपर्दा किया तो उनके स्टूडियो पर हमला किया गया। द्वितीय खाड़ी युद्ध में अमेरिका ने एक तरह से अघोषित सेंसरशिप लागू किया था, क्योंकि अमेरिकी संचार माध्यमों पर उन्हीं सूचनाओं व समाचारों का प्रसारण व प्रकाशन किया जाता था, जो अमेरिकी शासन की नीतियों के अनुरूप होती थी। इसके विपरीत प्रसारण या प्रकाशन करने का प्रयास करने वालों को सेंसर और शस्त्र के बल से दबाने का पुरजोर प्रयास किया। उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट है कि अंतर्राष्ट्रीय संचार में सूचनाओं के राजनीतिक इस्तेमाल की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे जहां सूचना व समाचार का स्वतंत्र व निष्पक्ष प्रवाह बाधित हो रहा है, वहीं सूचना प्राप्त करने के वैयक्तिक अधिकार का हनन भी हो रहा है। 
अंतर्राष्ट्रीय सूचना प्रवाह की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और निरंतरता संचार माध्यमों की परस्पर निर्भरता पर आश्रित होती है। अंतर्राष्ट्रीय संचार के दौरान एक देश के संचार माध्यम व समाचार समिति द्वारा दूसरे देश के संचार माध्यम व समाचार समिति को सूचना देने से समाचार का सतत् प्रवाह होता है। इसके लिए जितना सूचनाओं एवं समाचारों का संकलन अनिवार्य है, उतना ही उसे पाठकों व दर्शकों तक पहुंचाना। वैश्वीकरण के मौजूदा दौर में संचार माध्यमों के अंतर्राष्ट्रीयकरण के कारण विकासशील देशों के समक्ष सांस्कृतिक पहचान खोने का खतरा है, क्योंकि विकसित देश मीडिया उत्पाद (संचार माध्यमों में प्रकाशित व प्रसारित होने वाली सामग्री) के निर्यातक है। इनका निर्माण निर्यातक देश अपने सांस्कृतिक परिवेश को ध्यान में रखकर करते हैं। आयातक देश उसमें कोई परिवर्तन नहीं कर पाते हैं। इस प्रकार, आयातक देशों के समक्ष अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने का खतरा मड़रा रहा है। वर्तमान समय में पश्चिमी देश अपने मीडिया उत्पाद के माध्यम से अपरोक्ष रूप से सांस्कृतिक सामाज्यवाद स्थापित कर रहे हैं, जिससे सांस्कृतिक सामाज्यवाद का विस्तार होता है।

21वीं शताब्दी के मौजूदा दौर में अंतर्राष्ट्रीय संचार मानव जीवन का अनिवार्य अंग बन चुका है। इस दिशा में पिछले पांच दशकों से निरंतर विकास हो रहा है। वर्तमान समय में ऐसी वैश्विक परिस्थिति बन चुकी है कि विश्व की अद्यतर घटनाओं एवं सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने को मानव हर पल उत्सुक है, जिसमें आधुनिक संचार माध्यम (प्रिण्ट, इलेक्ट्राॅनिक व वेब) मदद करते हैं। इन संचार माध्यमों के कारण अंतर्राष्ट्रीय संचार बेहद आसान होने के कारण लगता है कि सूचना का मुक्त प्रवाह हो रहा है।

(प्रतियोगिता दर्पण अगस्त, 2015 में प्रकाशित)


मंगलवार, 30 जनवरी 2018

विकास संचार

विकास संचार बनाम संचार विकास

संचार का विकास एवं विकास संचार में व्यापक अंतर है। संचार के विकास से तात्पर्य संचार माध्यमों (समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टेलीविजन चैनलों, रेडियो स्टेशनों और अन्य संचार नेटवर्को ) के विकास से है, जबकि विकास संचार का अर्थ किसानों, महिलाओं, युवाओं, कामगारों व समाज के कमजोर वर्गो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने हेतु संचार की मदद विकास को विस्तार देने से सम्बन्धित है। विकास के लिए किए जाने वाले प्रत्यत्नों का संचार प्रमुख अंग है। लोगों को विकास कार्यक्रमों के प्रति सचेत करना तथा उनकी सहभागिता सुनिश्चत करना विकास संचार का उद्देश्य है, क्योंकि विकास प्रक्रिया तभी सार्थक होती है, जब उसमें लोगों की भागीदारी होती है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विकास संचार, जनसंचार की प्रमुख शाखा के रूप में तेजी से उभरा। संचार विशेषज्ञों ने सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक खुशहाली के लिए विकास संचार विषय पर केंद्रीय अनुसंधान किया तथा मानव जीवन को परिवर्तित कर बेहतर वातावरण एवं स्थितियों के निर्माण में दिलचस्पी दिखायी। इसका उद्देश्य समाज का पिछड़ापन दूर करना, नए विचारों व नई प्रौद्योगिकी को स्वीकार करने के लिए लोगों को तैयार करना है। यहीं कारण है कि 21वीं शताब्दी में विकास संचार एक प्रबल शक्ति माना जाता है।

विकास संचार के संदर्भ में विशेषज्ञों की अलग-अलग धारणाएं है। कुछ विद्वानों का मानना है कि संगठित सूचना प्रवाह या प्रणाली ही विकास संचार है। कुछ विद्वानांे का मानना है कि विकास संचार को संस्कृृति एवं सामाजिक परिवर्तनों के विविध पक्षों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है, जो लोग विकास संचार को संदेश सम्प्रेषण की प्रक्रिया तक सीमित रखते हैं, तो उचित नहीं है, क्योंकि यह आधुनिकीकरण की एक प्रक्रिया मात्र हैं, जिसे दूसरे शब्दों में प्रौद्योगिकी का प्रसार एवं उसे अपनाया जाना, लोगों में कुछ मूल्यों, पद्धतियों एवं व्यवहारों का समावेश करना है। संचार या सूचना लोगों को उत्प्रेरित करने वाले औजार हैं, जो आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में साहयक हो सकते हैं। यह उत्प्रेरक संचार, लोगों तक विकास सम्बंधी विचारों एवं प्रौद्योगिकी को लक्षित आडियंस या लोगों तक पहंचाती है। इस प्रकार आधुनिकीकरण प्रारूप् में विकास संचार प्रेरित करने वाली मार्केटिंग या विक्रय प्रक्रिया है।

लेकिन इस विकास संचार के मार्केटिंग मॉडल्स के आलोचक इसे पश्चिमी प्रौद्योगिकी वाली विचारधारा मानते हैं। इनका मत है कि लोगों का इस मॉडल के प्रति प्रेरित करने वाले अभियान लोगों का इस ओर ध्यान नहीं दिलाते जिस सांस्कृृतिक संदर्भ में वे जाते हैं। इनका यह भी मानना है कि विशाल विकास परियोजनाओं में भारी धनराशि नियोजित की जाती है। इसलिए ये परियोजनाएं जिनको लक्षित करके तैयार की जाती है, उनका अधिक हित नहीं करती है। उनका कहना है कि जिन विकासशील देशों में यूरोपीय लोग कार्य करते हैं, उसके लिए इन देशों में विशेषज्ञता उपलब्ध है। इसके अलावा इन विकासशील देशों के भ्रष्ट नेता एवं सरकारी कर्मचारी, विेश्शी सहायता के नाम पर धन कमाते हैं। इसलिए गरीबी एवं अमीरी के बीच का फासला बढ़ता है। इसलिए इन आलोचकों का मत है कि विकास संचार एक मत निर्माण की प्रक्रिया है। यह किसी भी देश्श के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर आधारित नहीं होनी चाहिए तथा किसी देश की संस्कृृति के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए। यह मात्र सूचनाएं देने एवं नवीनता का समाहित करने मात्र तक की प्रक्रिया नहीं है। विकास संचार प्रक्रिया में समाज के उन गरीब, कमजोर महिलाओं व अन्य लोगों की भागीदारी होनी चाहिए, जो सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में एक कोने में ढकेल दिए जाते हें। इस प्रकार विकास संचार का कार्य मात्र सूचना प्रसारित करना नहीं बल्कि संचार के संगठनात्मक मूल्यों को ध्यान में रखना भी है। विकास संचार को सामाजिक कार्यो, सामुदायिक मनोविज्ञान, सामुदायिक संगठन एवं अन्य क्षेत्रों से जो लोगों को शक्तिशाली बनाते हैं, उनसे अवधारणाएं एवं उनके क्रियान्वयन करने की प्रेरणा लेने की जरूरत है।

स्वतंत्रता की विचारधारा वाले लोग विकास संचार को अन्य रूप में परिभाषित करते हैं। इनका मत है कि शोषण एवं दबाव से मुक्ति या स्वतंत्रता, समुदाय एवं व्यक्ति को शक्तिशाली बनाना ही विकास संचार का लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए विकास संचार, संदेश्शों को आदान-प्रदान नहीं बल्कि यह व्यक्ति एवं समाज को ऊंचा उठाने की प्रक्रिया है। इस प्रकार समाज का उत्थान होने से यह अपने भविष्य के निर्माण करने की दिशा में स्वतंत्र होगा। इसमें हर व्यक्ति की भागीदारी होनी चाहिए। यह माना गया है कि जब लोगों को शोषण के स्रोत एवं अपनी शक्ति के स्रोत का ज्ञान हो जायेगा तो वे अपनी समस्याओं का निदान स्वयं करने लगेंगे। लोगों के बीच या छोटे समूहों के बीच जब संवाद कायम होगा तो लोगों में अपनी शक्ति के प्रति जागृृति आयेगी। यह संचार प्रक्रिया, विकास में भागीदारी निभाने वाले लोगों के सामने उन मुद्दों को उद्घाटित करेगी, जो उनके लिए अहम हैं।

विकास संचार का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें शैक्षणिक संचार, जनसंख्या एवं स्वास्थ्य संचार, वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी संचार, कृृषि संचार, पर्यावरण संचार, ग्रामीण संचार आदि शामिल है। विकास सम्बन्धी प्रतिवेदनों, स्पष्टीकरणों, विचार-विमर्शो, विश्लेषणों, मूल्यांकनों आदि के सभी पक्षों पर ध्यान देकर विकास कार्यो को ऊर्जा देने का प्रयास किया जाता है। विकास संचार विशेषज्ञों का मानना है कि- भाग्य कभी ऊपर से नहीं टपकता है। व्यक्ति को स्वयं प्रयत्न करके अपने भाग्य का उदय करना पड़ता है। जनसंचार के क्षेत्र में यह धारणा है कि व्यक्ति स्वयं अपनी स्थितियों में परिवर्तन ला सकता है। विकास के विभिन्न प्रकारों में ग्रामीण संचार पर विशेष जोर दिया जाता है, क्योंकि जहां विकास की सर्वाधिक जरूरत ग्रामीण क्षेत्रों में होती है, वहीं विकास संचार का अधिक महत्व होता है।
Source:- http://bjmc220406.blogspot.in/2016/02/blog-post.html

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

Empirical research(अनुभवजन्य अनुसंधान)

अनुभवजन्य और वैचारिक रूप से दो दृष्टिकोण हैं जिन्हें आमतौर पर एक शोध आयोजित करते समय नियोजित किया जाता है। संकल्पनात्मक को शोधकर्ताओं के रूप में विश्लेषणात्मक भी कहा जाता है, जबकि अनुभवजन्य विश्लेषण एक पद्धति है जो अवलोकन और प्रयोग के माध्यम से एक दी गई परिकल्पना का परीक्षण करता है।
अनुभवजन्य अनुसंधान में, डेटा संग्रह अवलोकन और प्रयोग के माध्यम से किया जाता है। यदि कोई परिकल्पना है, और दो वैज्ञानिक इस पर अलग-अलग निरीक्षण और प्रयोग के माध्यम से जानकारी इकट्ठा करते हैं, तो वे अनुभवजन्य शोध में अवलोकन के भाग के कारण थोड़ा भिन्न परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, जो कि अलग होने के लिए बाध्य है क्योंकि दो अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग धारणाएं हो सकती हैं अनुसंधान के अवलोकन भाग का आयोजनसंकल्पनात्मक विश्लेषण सामाजिक विज्ञान और दर्शन में विश्लेषण का पसंदीदा तरीका है। प्रमेय के विषय में गहरे दार्शनिक मुद्दे की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए, यहां एक शोधकर्ता अपने घटक भागों में एक प्रमेय या अवधारणा को तोड़ देता है। यद्यपि विश्लेषण की इस पद्धति ने लोकप्रियता पाई है, इस पद्धति की तेज आलोचनाएं हैं। हालांकि, अधिकांश मानते हैं कि वैचारिक विश्लेषण विश्लेषण का एक उपयोगी तरीका है, लेकिन बेहतर, समझा जा सकने वाले परिणामों के उत्पादन के लिए विश्लेषण के अन्य तरीकों के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए।
अनुभवजन्य अवलोकन और प्रयोग पर निर्भर है, और जांच करने योग्य परिणाम पैदा करता है, यह ज्यादातर वैज्ञानिक अध्ययनों में प्रयोग किया जाता है.

A.D. de Groot's empirical cycle

Observation: The observation of a phenomenon and inquiry concerning its causes.
Induction: The formulation of hypotheses - generalized explanations for the phenomenon.
Deduction: The formulation of experiments that will test the hypotheses (i.e. confirm them if true, refute them if false).
Testing: The procedures by which the hypotheses are tested and data are collected.
Evaluation: The interpretation of the data and the formulation of a theory - an abductive argument that presents the results of the experiment as the most reasonable explanation for the phenomenon.