गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

शराब समाज के लिए घातक

दोस्तों मैं देख रहा हूँ कि सभी राज्यों में शराब के कारण समाज दूषित हो रहा है और घर के अन्दर व बाहर महिलाएं हिंसा की शिकार हो रही हैं। एक तरफ लगभग सभी राज्यों की सरकार ने पंचायतों में महिलाओं को पचास फीसद आरक्षण दे दिया तो दूसरी तरफ प्रत्येक पंचायत में शराब की दुकान खोलने का लाइसेंस दे दिया। इस कारण गांवों की स्थिति बदतर होती जा रही है। शराब के कारण बिहार में 37.2 फीसद शादीशुदा महिलाएं अपने पति 
द्वारा प्रताडि़त हो रही हैं।सरकार शराब को राजस्व उगाही का मुख्य स्त्रोत बना रही है। यह महिलाओं को जीते जी नरक में ढकेलने जैसा है। केन्द्र सरकार को अपनी शराब नीति पर पुर्नविचार करना चाहिए।और राज्यों को इस दिशा में निर्देश जारी करनी चाहिए | गांव- गांव शराब दुकान खोलकर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। स्कूल- कालेजों के पास शराब की दुकानें खोली जा रही हैं।..इस समस्या पर कारगर कदम उठाने की जरुरत है ...| मित्रों आप सब की क्या राय है ????

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

आम आवाज़ विकल्प सोशल मीडिया

स्विज़रलैंड मे यह व्यवस्था है की अगर आप कही कोई जुर्म होते या क़ानून टूटते हुए देख रहे है तो आप उस दृश्य को अपने मोबाइल के कैमरे मे कैद कर एक ख़ास वेबसाइट पर डाल सकते है जहाँ से सरकार उस पर कार्येवाही कर सकती है, इसके प्रभाव का आंकलन इस बात से किया जा सकता है की वहां कोई "च्वीन्ग्म" तक खा के नहीं थूकता! आज हिन्दुस्तान मे हर किसी के पास मोबाइल फ़ोन की सुविधा है, इन्टरनेट तक पहुँच भी आसान है तो हमारे देश मे इस विकल्प को क्यों नहीं अपनाया जा रहा! मै यह नहीं कह रहा की हम इस तरह के विकल्प से अन्भिग्ये है क्योंकि फेसबुक पर ट्रेफिक पुलिस द्वारा इस तरह की शुरुवात पहले ही की जा चुकी है और आज एक लाख से भी ज्यादा लोग इस से जुड़े हुए है और इसके द्वारा जो भी कर्येवाही अभी तक की गयी है उसमे ज्यादा श्र्ये जनता को ही जाता है, लोगो ने गलत नंबर प्लेट वाली गाडियों की तस्वीरे इस प्रष्ट पर डाली और गैर सरकारी वाहनों पर लगी लाल बतियों की तस्वीरे भी इस प्रष्ट पर डाली और नतीजा ऐसा था जिसकी कल्पना कम ही की जाती है की कई रसूख वाले लोगो को भी कानून के आगे झुकना ही पड़ा! पर इसको सिर्फ उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है क्योंकि किसी भी बड़े स्तर पर सोशल मीडिया की ताकत का इस्तमाल अभी भी शुरू नहीं हुआ है जो की भारत जैसे देश मे काफी जरूरी भी है!
हमारे देश की व्यवस्था काफी जटिल है और जटिलता से निपटने के लिए पारदर्शिता की जरुरत होती है और यह सोशल मीडिया पारदर्शिता की स्थापना कर सकता है! कुछ समय पहले तक जब लोकपाल के विषय मे बात चल रही थी तो कहा जा रहा था की लोकपाल को सारी ताकत नहीं दी जा सकती और इसी कारण यह मुद्दा ठन्डे बसते मे भी चला गया पर उस समय तक भी सोशल मीडिया का विकल्प किसी ने नहीं दिया! इसमें ताकत जनता के हाथो मे रहेगी जो की लोकतंत्र की बुनियाद है, फैसला भी न्याययालय द्वारा ही किया जायेगा जो की संविधान के अंतर्गत होगा और लाभ भी जनता को ही पहुंचेगा, यह लोकपाल का अच्छा विकल्प हो सकता था पर इस और ध्यान किसी ने नहीं दिया और वह भी तब जब भारत का एक बहुत बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया से जुडा हुआ है! जब सोशल मीडिया द्वारा भरष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है तो सोशल मीडिया द्वारा ही भरष्टाचार के खिलाफ लड़ा क्यों नहीं जा सकता? आखिर कितना मुश्किल होगा अगर आपसे कोई रिश्वत मांगे और आप उसका सबूत सोशल मीडिया द्वारा सम्बंधित विभाग तक पंहुचा दे! मेरे अनुसार भरष्टाचार के खिलाफ इस से अच्छा हथियार कोई नहीं हो सकता!
पर मै यह मानता हूँ की हमारी सरकार इस विकल्प को जान चुकी है इसीलिए कोई न कोई बहाना बना कर इन पर नियंत्रण कसने की साजिश कर रही है! सरकार का कहना है की ऐसा सामजिक और धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुँचने से रोकने के लिए किया जा रहा है तो मै पूछता हूँ की अगर एक बार कोई गलत तस्वीर साइट्स से हटा भी दी जाती है तो कैसे माना जाये की उस तस्वीर को डालने वाला फिर कोई ऐसी तस्वीर नहीं डालेगा और कैसे इस बात का निर्धारण होगा की क्या सही है और क्या गलत? एक उदहारण दे कर समझाना चाहूँगा की लोकपाल आन्दोलन के दौरान सरकार की आलोचना करते कई चित्र फेसबुक पद डाले गए या ट्विट्टर पर भी कई सरकार विरोधी बातें कही गयी और यदि सरकार के पास इन सब पर नियंत्रण करने की ताकत होगी तो जायज सी बात है की सरकार इन सब को भी गलत मान कर हटा देगी! तो जरुरत है जल्द से जल्द सोशल मीडिया की असली ताकत को सही तरह से उपयोग करने की!
                                                                                                      साभार :-उधार 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

दंत-हीन लोकपाल ! हाय रे कांग्रेस !




गहन माथापच्ची के बाद कैबिनेट से लोकपाल बिल को मंजूरी मिलने के बाद सरकार लोकपाल बिल को संसद में 22 दिसंबर को पेश करने जा रही है. इसे दंतहीन लोकपाल बताया जा रहा है जिसको लेकर अन्ना और सरकार के बीच तय है कि विरोधाभास और बढेगा और संसद की लड़ाई सड़क तक आनी तय है. कैबिनेट ने मंगलवार शाम को लोकपाल बिल पारित तो दिया, लेकिन अन्ना हजारे इसमें सीबीआई पर जो चाहते थे उसे स्वीकारा नही गया. सूत्रों का दावा है कि जिस लोकपाल को आना है उसके पास न तो अधिकार होंगे ना ताकत। इससे बिफरे अन्ना ने धमकी दी है कि वह मुंबई में 27 से 29 तक तीन दिन उपवास करेंगे और फिर 30 दिसंबर से जेल भरो आंदोलन शुरू होगा। अन्ना ने कहा यह सरकार अंधी और बहरी हो गई है।

दरअसल लोकपाल बिल अन्ना की ज्यादातर अहम मांगों से परे है. अन्ना हजारे कहते रह गए कि सीबीआई, ग्रुप-सी और न्‍यायपालिका को लोकपाल के अधीन लाया जाए. अन्ना चाहते थे कि सीबीआई लोकपाल के अधीन हो.लेकिन प्रस्तावित विधेयक में सीबीआई का अलग अस्तित्व बना रहेगा.ख़ास यह है कि अन्ना चाहते थे सीबीआई निदेशक की नियुक्ति लोकपाल की तरह हो मगर पेंच यह है कि है कि सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष का नेता और चीफ जस्टिस मिलकर करेंगे. यह एक नई पहल है कि सिर्फ सरकार ही निदेशक की नियुक्ति नहीं करेगी. सीबीआई में एसपी और उससे ऊपर के अफसरों के चयन के लिए भी कमेटी होगी. अन्ना चाहते थे कि सीवीसी भी लोकपाल के अधीन काम करे, लेकिन सरकार ने उसे भी अलग रखा है. अन्ना हजारे की मांग थी कि ग्रुप-सी के कर्मचारी लोकपाल के दायरे में हों, लेकिन सरकार ने इसकी जिम्‍मेदारी सीवीसी को सौंप दी है.

सबसे अहम् अन्ना हजारे की मांग थी कि सरकारी बिल में व्यवस्था की गई है कि प्रधानमंत्री के खिलाफ तभी जांच हो सकेगी जब लोकपाल बेंच के तीन चौथाई सदस्य इस पर सहमत हों. प्रधानमंत्री की सुनवाई इन-कैमरा होगी यानी मीडिया और आम जनता वो सुनवाई नहीं देख सकेंगे. कुछ शर्तों के साथ पीएम जरूर लोकपाल बिल के अंदर आ गये हैं। सरकार के इस नये लोकपाल में केस लड़ने के लिए एक टीम होगी और जांच करने के लिए भी एक टीम होगी. लोकपाल में नौ सदस्य होंगे. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज इसके चेयरमैन होंगे. लेकिन लोकपाल को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा स्पीकर, लोकसभा में विपक्ष की नेता, चीफ जस्टिस और सरकार के ही चुने एक मशहूर वकील होंगे. अन्ना चाहते थे कि शिकायत करने वालों को तंग न किये जाने की सरकारी व्यवस्था हो लेकिन सरकार शिकायत करने वालों की रक्षा के लिए अलग व्हिसल ब्‍लोअर बिल ला रही है. इससे शिकायत करने वालों की पहचान छिपाई जा सकेगी.

अब अन्ना हजारे ने साफ़ तौर पर कहा कि भ्रष्टाचार खत्म करने को लेकर सरकार की नीयत साफ नहीं है. और ये भी कि उन्हें लोकपाल का नया मसौदा मंजूर नहीं.उन्हें सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। उन्होंने हमें धोखा दिया है। सरकार की नीयत साफ नहीं है वो लोकपाल को लेकर बिल्कुल भी गंभीर नहीं है। उसकी पोल खुल जायेगी इसलिए वो सीबीआई पर से अपना अंकुश हटाना नहीं चाहती है। सरकार ने हमारा और संसद का अपमान किया है। इधर सरकार ने भी अन्ना हजारे की मांगों के सामने झुकने से इनकार कर दिया है और कहा है कि लोकपाल के दायरे में सीबीआई नहीं आएगी। सीबीआई के प्रमुख का चुनाव प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश मिलकर करेंगे। वहीं प्रधानमंत्री भी कुछ शर्तों के साथ ही लोकपाल के दायरे में होंगे। अब यह बिल गुरुवार को लोकसभा में पेश किया जाएगा। इस पर विपक्ष क्या रुख अपनाता है यह देखने वाला मुद्दा होगा.अन्ना हजारे को मुंबई में 13 दिनों के अनशन की मंजूरी भी मिल गई है.

रविवार, 4 दिसंबर 2011

‘तू तो ना आए, तेरी याद सताए’





ताउम्र जिंदगी का जश्न मनाने वाले ‘सदाबहार’ अभिनेता देव आनंद सही मायने में एक अभिनेता थे, जिन्होंने अंतिम सांस तक अपने कर्म से मुंह नहीं फेरा।हिन्दी फिल्मों के सदाबहार अभिनेता देव आनंद के निधन से बॉलीवुड में ही नहीं पुरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। देव साहब की तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में एक ऐसे शख्स की है, जिसका पैमाना न केवल जिंदगी की रूमानियत से लबरेज था, बल्कि जिसकी मौजूदगी आसपास के माहौल को भी नई ताजगी से भर देती थी।
इस करिश्माई कलाकार ने ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...’ के दर्शन के साथ जिंदगी को जिया। यह उनकी 1961 में आई फिल्म ‘हम दोनों’ का एक सदाबहार गीत है और इसी को उन्होंने जीवन में लफ्ज-दर-लफ्ज उतार लिया था।
देव साहब ने शनिवार रात लंदन में दुनिया को गुडबॉय कह दिया। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। वैसे तो वह जिंदगी के 88 पड़ाव पार कर चुके थे, लेकिन वह नाम जिसे देव आनंद कहा जाता है, उसका जिक्र आने पर अभी भी नजरों के सामने एक 20-25 साल के छैल-छबीले नौजवान की शरारती मुस्कान वाली तस्वीर तैर जाती है, जिसकी आंखों में पूरी कायनात के लिए मुहब्बत का सुरूर है।
देव साहब के अभिनय और जिंदादिली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कलाकारों ने फिल्मों में नायक की भूमिकाएं करना छोड़ दिया था, उस समय भी देव आनंद के दिल में रूमानियत का तूफान हिलोरें ले रहा था और अपने से कहीं छोटी उम्र की नायिकाओं पर अपनी लहराती जुल्फों और हॉलीवुड अभिनेता ग्रेगोरी पैक मार्का इठलाती टेढ़ी चाल से वह भारी पड़ते रहे। ‘जिद्दी’ से शुरू होकर देव साहब का फिल्मी सफर, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘देस परदेस’, ‘हरे रामा हरे कृष्ण’ जैसी फिल्मों से होते हुए एक लंबे दौर से गुजरा और अपने अंतिम सांस तक वह काम करते रहे।
उनकी नई फिल्म ‘चार्जशीट’ रिलीज होने के लिए तैयार है और वह अपनी फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ की अगली कड़ी पर भी काम कर रहे थे। लेकिन इस नई परियोजना पर काम करने के लिए देव साहब नहीं रहे। बीते सितंबर में अपने 88वें जन्मदिन पर उन्होंने पीटीआई को दिए अंतिम साक्षात्कार में कहा था, ‘मेरी जिंदगी में कुछ नहीं बदला है और 88वें साल में मैं अपनी जिंदगी के खूबसूरत पड़ाव पर हूं। मैं उसी तरह उत्साहित हूं, जिस तरह 20 साल की उम्र में होता था। मेरे पास करने के लिए बहुत काम है और मुझे ‘चार्जशीट’ के रिलीज होने का इंतजार है।’
मैं दर्शकों की मांग के अनुसार, ‘हरे रामा हरे कृष्णा आज’ की पटकथा पर काम कर रहा हूं। देव साहब की फिल्में न केवल उनकी आधुनिक संवेदनशीलता को बयां करती थीं, बल्कि साथ ही भविष्य की एक नई इबारत भी पेश करती थीं।
वह हमेशा कहते थे कि उनकी फिल्में उनके दुनियावी नजरिए को पेश करती हैं और इसीलिए सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों पर ही आकर बात टिकती है। उनकी फिल्मों के शीर्षक ‘अव्वल नंबर’, ‘सौ करोड़’, ‘सेंसर’, ‘मिस्टर प्राइम मिनिस्टर’ तथा ‘चार्जशीट’ इसी बात का उदाहरण है।

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

ऐसा क्यों होता है ?


ऐसा क्यों होता है?
ऐसा क्यों होता है? कभी-कभी हम किसी से कुछ कहना चाहते हैं, पर यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि कहीं कोई हमारी बात का गलत मतलब न निकाल ले। बस हमारे दिल की बात दिल में ही रह जाती है। हां कभी कोई ऐसा भी चमत्कार हो जाता है जब हमारी बात जुबान बनकर किसी तक पहुंच जाती है और हम उस स्थिति से बच जाते हैं, जो हमारे कहने से बिगड़ भी सकती थी। हमारा दिल तो आईने की तरह बिल्‍कुल साफ है, लेकिन किसी की नजर में हम बुरे बन जाएं, यह भी हमें गंवारा नहीं। अगर वह शख्स खुद चलकर हमसे बात करता है, जो बात हमने कहनी थी, तो ऐसा लगता है जैसे हमारे मन के उपवन में फूल खिल उठे हों और हमारे दिल का बोझ एकदम हल्का हो जाता है। है न कितनी अजीब बात...हम इतने शक्तिवान होकर भी अंदर से कितने कमजोर हैं। हमारा व्यक्तित्व हमारी सबसे बड़ी पूंजी है, जिसकी वजह से यह दुनिया हमें जानती है।

सोमवार, 19 सितंबर 2011

नरेन्द्र मोदी और भाजपा की दुविधायें


अमेरिकी संसद में प्रस्तुत एक रिपोर्ट में नरेन्द्र मोदी को भाजपा के तरफ से प्रधानमत्री पद का दावेदार बताया जाना, अमेरिका की बदलती प्राथमिकताओं को दर्शाता है. यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी विदेशनीति और वैदेशिक मुआमलों में उसने अपने नजरिये में उलटफेर किया हो. जब-जब अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में कोई बड़ा मिसनरी बुखार पनपता है , तो अमेरिका बावला हो अत्यधिक संवेदनशील हो उठता है. तब उसे मानवधिकार, विश्व शांति और अन्य वैश्विक नियम बड़े महत्वपूर्ण नज़र आने लगते हैं. किन्तु अगले ही दृश्य में जब एक स्वस्थ माहौल बनता दिखाई देता है, तो वहीँ अमेरिका अपने राग तुरंत बदल देता है.

यह 1988 में क्यूबा के लिए उपजी हमदर्दी हो जिसके पश्चात् अमेरिकिओं द्वारा प्युर्टो रिको और फिलिप्पिन्स में बड़े उद्धोग बैठा, उनके बाज़ार पर कब्ज़ा करने का खेल शुरू हुआ. बाद में जब इसकी भर्त्सना होने लगी तो अमेरिका के पास इस कार्यवाही का कोई जवाब नहीं था. वह एक नियत समय में वहीँ करता है , जो उसे उस वक्त फायदेमंद मालूम पड़ता है. नौ-ग्यारह के हमले के बाद अमेरिका ऐसे ही पूरे विश्व के शांति के लिए संवेदनशील हो उठा. विश्व शांति की दुहाई देकर उसने मानवाधिकारों , सुरक्षा परिषद् तक की भी चिंता नहीं की और अफगानिस्तान में अपनी मनमानी करता रहा. आज विश्व के अन्य हिस्सों में हो रहे आतंकवादी घटनाओ के प्रति अमेरिका की कोई तीक्ष्ण प्रतिक्रिया नहीं सुनाई देती. मध्य एशिया में अपनी मनमानी कर लेने के बाद आज जब रॉबर्ट गेट्स यह कहते हैं
की हमारे पास एक थकी-हारी मेलेट्री के सिवा कुछ भी नहीं , तो इसे सार्वजनिक सराहना मिलती है. कुल मिलकर मोदी को लेकर अमेरिका के दृष्टिकोण में आया बदलाव उसकी पुरानी फितरत का ही एक नमूना है.

गौरतलब है कि यह वहीँ अमेरिका है जिसने मोदी को दो बार वीजा देने से इनकार कर दिया था. और जिसने मोदी पर ‘मानवता का दुश्मन’ होने तक की बात कही. आज वहीँ अमेरिका मोदी के सुशाशन और कानून व्यवस्था की दुहाई देते नहीं थक रहा. इसके पीछे दो बातों को समझना पड़ेगा. एक तो वर्तमान सरकार की लोकप्रियता में आये जबरदस्त गिरावट ने बीजेपी की स्थिति पर असर डाला है.

कमजोर ही सही पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के कारण भाजपा को बेनिफिट ऑफ़ डाउट जरूर मिलेगा. ऐसे में भाजपा के सामने नेतृत्व की बड़ी कमी नज़र आती है . हालाँकि भाजपा अपने को प्रभावी नेतृत्व से रहित नहीं बताती. भाजपा के सामने शिवराज सिंह चौहान और नरेन्द्र मोदी जैसे ऐसे दिग्गज नेता है, जिन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरने की जरूरत है. भाजपा की सबसे बड़ी विडम्बना यहीं रही कि उसने कभी अपने ही सिद्धांतों पर विश्वास नहीं किया. भाजपा को गाना तो राष्ट्रवाद का पसंद है पर पॉप पर झुमने से भी बाज नहीं आती. उसकी इसी दुविधा ने मतदाताओं के मन में उसे साशन का विकल्प नहीं माना.
भाजपा सरकार का विकल्प तो हो सकती है, पर विदेश निति , आतंकवाद , अमेरिकापरस्ती और बाजारवाद जैसी मुद्दों पर वह कांग्रेस से इतर कोई अलग निति या तो रखती नहीं है या उसे ज़ाहिर नहीं कर पाती.
अमेरिका अब अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के गिरते ग्राफ को समझ चुका है. अन्ना आन्दोलन ने कांग्रेस का बेडा गर्क कर दिया. कहाँ कांग्रेस ने सोचा था कि सारी गलातिओं का ठीकरा मनमोहन के सर फोड़ कर राहूल भैया को नया कर्णधार बता अगला चुनाव भी जीत जायेंगे. पर राहुल का बचपना इस आन्दोलन के दौरान साफ़ उभर कर आ गया . बेहतर होता की राहुल अन्ना के साथ मंच पर हाज़िर हो जाते तो कम से कम जनता राहूल को सरकार से अलग अपने साथ मानती.


दुसरे, विश्व आर्थिक परिदृश्य में एक और मंदी का दौर शुरू होने को है . और यह मंदी का केंद्र इस बार यूरोप का बाज़ार होगा. अमेरिका की अधिकांस कम्पनियों द्वारा यूरोपीय बाज़ार के घाटे ने विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है. ज़ाहिर है यूरोप से अपना बोरिया बिस्तर समेटने वाली यह कम्पनियाँ भारत और ब्राजील जैसे नए बाज़ार की और रुख करेंगी. ऐसे में अमेरिका के लिए गुजरात से बेहतर और कोई भी स्टेट नहीं हो सकता. अब गुजरात मोदी के हाथ में है तो अमेरिका का यह रवैया तो आना ही था.

ऐसे में भाजपा के सामने यह सवाल यह आता है कि वह नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रीय परिदृश्य पर भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने का सहस जुटा पाती है?

लेखक : कनिष्क कश्यप

लेखक न्यू मीडिया विशेषज्ञ है.

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

जेपी और अन्ना आन्दोलन में फर्क

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ईमानदार थे, और अन्ना हजारे की छवि भी ईमानदार है। परन्तु, दोनों आंदोलनों में बड़ा फर्क है। जेपी का आंदोलन संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन के लिए था, जबकि अन्ना का एक सूत्री मुद्दा भ्रष्टाचार है। वैसे, भ्रष्टाचार का विरोध भी जेपी आंदोलन का एक हिस्सा था। भ्रष्टाचार के सभी पहलुओं-सामाजिक, आर्थिक, नैतिक आदि, पर उस आंदोलन में जोर रहा। जेपी का जीवन राजनीतिक, सामाजिक एवं 42 के आंदोलन के अनुभवों से जुड़ा रहा। उनका कैनवास बहुत बड़ा था। प्रधानमंत्री के कद के सामने उनका व्यक्तित्व किसी तरह कम नहीं था। जेपी संसदीय व्यवस्था में बहुत जोर देते थे। पूरे आंदोलन के दौरान उन्होंने संसदीय व्यवस्था को और मजबूती प्रदान करने का ही काम किया। बड़ी बात तो यह है उनका आंदोलन किसी ब्लू-प्रिंट पर आधारित नहीं था। जेपी आंदोलन खुद परिस्थिति के मुताबिक अपनी धारा तय करता रहा। जेपी के साथ भीड़ नहीं थी। उनके साथ प्रतिबद्ध लोग थे।

उनके अनुसार बड़ी संख्या से किसी आंदोलन में क्षणिक लाभ लाभ हो सकता है, परन्तु जज्बात को समाप्त होने में देर भी नहीं लगती। भीड़ दिशा नहीं तय कर सकती। प्रतिबद्ध कार्यकर्ता ही इस काम में सहयोग दे सकते हैं। वैसे, यह बड़ी बात है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना बड़ा आंदोलन हो रहा है। भ्रष्टाचार से पूरा देश त्रस्त है, और इसे मिटाये बिना देश तरक्की भी नहीं कर सकता।