गुरुवार, 9 नवंबर 2017

इंटरनेट पत्रकारिता

इंटरनेट  पर समाचारों का प्रकाशन या आदान-प्रदान इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है। इंटरनेट पत्रकारिता दो रूपों में होती है। प्रथम-समाचार संप्रेषण के लिए नेट का प्रयोग करना  दूसरारिपोर्टर अपने समाचार कोई-मेल  द्वारा अन्यत्र भेजने    समाचार को संकलित करने  तथा  उसकी सत्यता,विश्वसनीयता सिद्ध करने तथा उसकी सत्यताविश्वसनीयता सिद्ध करने के लिएकरता है।
   इंटरनेट पत्रकारिता का इतिहास:
   विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास निम्नलिखित चरणों में हुआ-
    (प्रथम चरण------- १९८२ से १९९२
    (द्वितीय चरण------- १९९३ से २००१
    (तृतीय चरण------- २००२ से अब तक
 भारत में इंटरनेट पत्रकारिता का पहला चरण १९९३ से तथा दूसरा चरण  २००३ सेशुरू माना जाता है। भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटें ’रीडिफ़डॉट कॉम’, इंडिया इफ़ोलाइन’  ’सीफ़ी’ हैं  रीडिफ़ को भारत की पहली साइट कहाजाता है   वेब साइट पर विशुद्ध पत्रकारिता  शुरू करने का श्रेय  ’तहलका डॉट्कॉमको जाता है।

हिंदी में नेट पत्रकारिता ’वेब दुनिया’ के साथ शुरू हुई। यह हिन्दी का संपूर्ण पोर्टल है।  प्रभा साक्षी  नाम का अखबार  प्रिंट रूप में  होकर सिर्फ़ नेट पर ही उपलब्ध है।आज पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दी की सर्व श्रेष्ठ साइट बीबीसी की हैजो इंटरनेटके मानदंडों के अनुसार चल रही है। हिन्दी वेब जगत में ’अनुभूति’, अभिव्यक्ति,हिन्दी नेस्टसराय आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ भी अच्छा काम कर रही हैं।  अभीहिन्दी वेब जगत की सबसे बडी़ समस्या मानक की बोर्ड तथा फ़ोंट  की है  डायनमिक फ़ौंट  के अभाव के कारण हिन्दी की ज्यादातर साइटें खुलती ही नहीं हैं 


आधुनिक  युग में इंटरनेट पत्रकारिता ने सूचना संप्रेषण के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इंटरनेट आज सूचना प्रौद्योगिकी का केंद्र बिंदु बन गया है। इंटरनेट के माध्यम से प्रदान किए जाने वाले समाचारों को इंटरनेट पत्रकारिता कहा जाता है। वर्तमान समय में आज प्रत्येक समाचार पत्र रेडियो, इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल, समाचार एजेंसियों की  अपनी वेबसाइटें हैं, जिनमें हम न केवल देश-विदेश की खबरें पढ़ सकते हैं, बल्कि हर मिनट के बाद हर ताजा घटना की आसानी से जानकारी ले सकते हैं। इंटरनेट जर्नलिज्म के इस युग में यदि हम पूरे विश्व को ग्लोबल विलेजकहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से हम 365 दिनों में हर मिनट के बाद देश-विदेश की ताजा घटना की निरंतर जानकारी हासिल कर सकते हैं। इस दोहरे संचार के माध्यम से मीडिया लोगांे की किसी मुद्दे पर तुरंत फीडबैक भी प्राप्त कर सकती है।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

नेहरू की नज़र में देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति के योग्य नहीं थे

आजादी के बाद देश को पहला राष्ट्रपति देने के लिए सिवान आज जो गर्व का अनुभव करता है, इसका पूरा श्रेय सरदार बल्लभ भाई पटेल को जाता है। पं. जवाहरलाल नेहरू ने तो ठान लिया था कि जैसे भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति नहीं बनने देना है लेकिन बल्लभ भाई पटेल को ऐसे ही सरदार की उपाधि नहीं मिली। वे इतने असरदार थे कि पं. नेहरू की इच्छा सिवान की धरती पर जन्मे, यहां की मिट्टी में लोट-पोटकर बड़े हुए राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति बनवाकर ही दम लिया।
जीरादेई निवासी बच्चा ¨सह तथा जेपी सेनानी महात्मा भाई ने बताया कि राजेंद्र बाबू को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रपति नहीं बनाना चाहते थे। जब औपबंधिक राष्ट्रपति नियुक्त करने की बात चल रही थी, तब नेहरू ने सी राजगोपालाचारी का नाम प्रस्तावित कर दिया था, जिसका अनुमोदन खुद डॉ.राजेंद्र प्रसाद करने के लिए उठ गए थे लेकिन सरदार पटेल द्वारा डांटकर बैठाने के बाद राजेंद्र बाबू चुप हो गए। सभा को समाप्त कर दिया गया। राजेंद्र बाबू जीरादेई चले आए। उधर पटेल जी ने देश भर के सभी बड़े नेताओं का हस्ताक्षर राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति बनाए जाने के पक्ष में कराया। 20 दिनों तक यह काम होता रहा। फिर राजेंद्र बाबू को खोजते-खोजते दिल्ली से अनुग्रह बाबू के साथ कुछ लोग जीरादेई आए और उनको मनाकर दिल्ली ले गए, जहां पर 26 जनवरी 1950 को उन्हें औपबंधिक राष्ट्रपति बनाया गया। महात्मा भाई बताते हैं कि उनकी माता जी भी देशरत्न के राष्ट्रपति बनने की कहानी बताती रही हैं। मां ने कहा था कि राजेंद्र बाबू को लेने के लिए दिल्ली से जो लोग आए थे, उनमें सरदार पटेल जरूर रहे होंगे। क्योंकि उस समय गांव में भी इसकी चर्चा खूब होती थी। लोग बताते थे कि जब तक सरदार पटेल लेने नहीं आएंगे, तब तक राजेंद्र बाबू दिल्ली नहीं जाएंगे। महात्मा भाई ने बताया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए पं. नेहरू ने झूठ तक का सहारा लिया था। नेहरू ने 10 सितंबर 1949 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी. राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होगा। नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डॉ.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। वे उस वक्त मुंबई में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा ही नहीं हुई थी। इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर 1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पार्टी में उनकी जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वे बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया।
जामापुर निवासी अति बुजुर्ग बांके बिहारी ¨सह ने राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति बनने के घटनाक्रम को अपनी डायरी में अंकित किया है। डायरी के पन्नों को पलटते हुए उन्होंने बताया कि सरदार पटेल ने पं. नेहरू को खुली चुनौती दी थी कि कार्यसमिति की बैठक में प्रस्ताव रखा जाए, जिसके पक्ष में ज्यादा समर्थक होंगे, उसे राष्ट्रपति बनाया जाएगा। नेहरू जानते थे कि कार्यसमिति के तीन चौथाई सदस्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में हैं तो उन्होंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।

शनिवार, 17 जून 2017

संचार सिद्धांत और भारतीय दर्शन

संचार संबंधी भारतीय अवधारणा के बारे में जानना काफी रोचक और दिलचस्प होगा। आधुनिक संकल्पना में अन्तर्राष्ट्रीय संचार एवं संवाद की बात जोर-शोर से की जाती है, जो भारतीय चेतना और स्मृति में गहरे व्याप्त है। भारत में केवल अंतःवैयक्तिक संचार के कई ऐसे अनछुए पहलू हैं, जो मनुष्य की आंतरिक सक्रियता को सूक्ष्म और सूक्ष्मेतर ढंग से व्याख्यायित करती हैं। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘गंगा महज एक नदी नहीं, हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, वाराणसी और वृंदावन महज शहर नहीं हैं। मनुष्य का अतीत संग्रहालयों में बंद नहीं है, न ही उसके देवता यूनानी देवताओं की तरह पौराणिक काल के स्मृति-चिन्ह्र हैं। मिथक और यथार्थ, पौराणिक स्मृति और वर्तमान जीवन, देवता और मनुष्य आज भी एक साथ रहते हैं। सैकड़ों विश्वासों, आस्थाओं, समृतियों और संस्कारों का यह संगम और पारस्परिक संपर्क-संवाद केवल भारतीय संस्कृति में ही संभव हो सकता था-जिसमें संपूर्ण मनुष्य की परिकल्पना निहित रहती है।’’ यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि भारतीय मानस संचार की अंतः-प्रेरणा को सिर्फ अपने भीतर समेटे रखने का आदी नहीं है। यहां विचारों, अनुभवों और जानकारियों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी सतत् प्रवाह है। यह परकाया प्रवेश की स्थिति है। भारतीय परंपरा में संवाद-चर्चा या शास्त्रार्थ का प्रभाव हर जगह विद्यमान है। ऋग्वेद में संवाद-सूक्त के अन्तर्गत दशम मंडल में सरया-पणि(कुतिया और गौ) संवाद है, तो यम-यमी तथा पुरूरवा-उर्वशी संवाद का भी उल्लेख है। मण्डल तीन में विश्वामित्र और नदी संवाद एवं कठोपनिषद् में नचिकेता-यम के बीच अद्भुत संवाद प्रकरण है। बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य ऋषि का मैत्रेयी और गार्गी से संवाद स्मरणीय है। इसी तरह रामचरितमानस में शिव-पार्वती संवाद और काकभुसुण्डी-गरुण संवाद भारतीय संचार की पारंपरिकता का शाश्वत प्रमाण हैं। इन अन्तर्वैयक्तिक संवादों में पूरी सृष्टि का लोक-व्यवहार समाहित है। भारतीय संचार-पद्धति में अंतःवैयक्तिक संचार एवं अंतर्वैयक्तिक संचार के अतिरिक्त समूह संचार के भी साक्ष्य मौजूद हैं। रामचरित मानस में वर्णित याज्ञवल्क्य ऋषि का ऋषि-सभा में संवाद तथा सुत्तपिटक् में महात्मा बुद्ध का अपने शिष्यों से संवाद उदाहरण हैं। ये शिष्य मत-नेता(व्चपदपवद स्मंकमत) होते थे, जिनका दायित्व गुरु की बातों को लोक में प्रचारित-प्रसारित करना होता था। संचार की भारतीय अवधारणा को समझने के लिए आत्म-चेतना और आत्म-दृष्टि का सर्वप्रथम विकास किया जाना आवश्यक है अन्यथा आधुनिक तकनीक और प्रौद्योगिकी आधारित संचार-तंत्र ही सर्वगुण संपन्न एवं सर्वशक्तिमान मालूम होंगे, जिनका हाल के दिनों में बतौर आयातित संस्कृति भारत में दखल तेजी से बढ़ा है। हाल ही में ब्रिटेन में किए गए एक सर्वेक्षण से स्पष्ट है-‘‘अब व्यक्ति को किसी से सीधे संवाद या संपर्क रखने और आसपास के लोगों के सुख-दुख में शरीक होने के बजाय आभासी संबंधों(टमतजनंस त्मसंजपवद) में ज्यादा दिलचस्पी है। आवाजों, शब्दों, गतियों, और रंगों की हर पल गतिमान बदलती आभासी दुनिया में खोया रहने वाला व्यक्ति न सिर्फ अकेला होता है, बल्कि सार्थक सामाजिक संबंध बना पाने के लिए भी नाकाबिल हो जाता है। इस स्थिति में नेट सर्च करना, ई-मेल करना, चैटिंग, सोशल नेटवर्किंग और टीवी देखना वास्तविक जीवन के प्रत्यक्ष सुख से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।’’ इस बात से इन्कार संभव नहीं है कि आज संबंधों में आत्मीयता के लिए जगह घटी है। सामाजिक वातावरण में मानवीयता के लिए स्थान सुरक्षित नहीं है। भारत प्रकारांतर से जीवन के जिस अनुभवजनित विचार-दृष्टि को सांस्कृतिक विरासत का संवाहक मानता आया है, वह आज नष्ट होने की कगार पर है। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘भारतीय संस्कृति का मनुष्य और सृष्टि से संबंध सार्वभौमिक संपूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है। भारतीय संस्कृति में आज भी समस्त विकृतियों मसलन ढोंग, पाखण्ड, कर्मकाण्ड, दकियानूसी आचरण, अंधविश्वास आदि के बावजूद वे तत्व मौजूद हैं, जिनके रहते मनुष्य को कभी इतनी स्पर्धा और अहम्केन्द्रित अभिमान नहीं हुआ कि प्रगति की लालसा में वह सृष्टिगत अनिवार्य संबंधों का ही संहार कर दे।’’ यह ब्रिटिश राजनीतिज्ञ लार्ड मैकाले की उस चिंता का निराकरण है, जिसमें उसने स्वीकार किया था-‘‘हम भारत में पश्चिमी संस्कृति का प्रभुत्व तब तक स्थापित नहीं कर पायेंगे, जबतक भारतीय शिक्षा पद्धति से संस्कृत भाषा को पूरी तरह निष्काषित नहीं कर देते।’’ यह सोच या विचारधारा मैकाले की व्यक्तिगत नहीं है। पूरे पश्चिम की अवधारणा संकीर्ण और पूर्वग्रह से ग्रसित है। असल में उनका समाज भारत की तरह सांस्कृतिक बहुलता और बहुभाषिकता से परिचित नहीं है और न ही उनमें एशियाई समाजों की भांति खुला सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो सका है। पश्चिम का संबंध दूसरी संस्कृतियों से हमेशा शक्ति आधारित रहा है। जिस कारण किसी और समाज की बौद्धिक संपदा की सराहना और उसे पचा सकने की प्रवृति उनमें नहीं है। खासकर भारत जैसे समाज की तो हरगिज ही नहीं, जो कभी पश्चिम का उपनिवेश रह चुका है। यूरोपीय विचारों के इतिहास में ज्ञानोदय का प्रादुर्भाव महत्वपूर्ण माना गया है। ज्ञानोदय का अर्थ विवेकवाद, तकनीकी केन्द्रीयता, ज्ञान और उत्पादन का मानकीकरण, रैखिक प्रगति, सार्वभौम और निरपेक्ष सत्य में विश्वास का प्रतिनिधित्व करने से है। इस चिंतन का असर तत्कालीन समाज पर इतना ज्यादा था कि पूरी दुनिया एक खास तरह की विचारधारा में समेटी जाने लगी। पश्चिम में पनपे विचार कसौटी बन गए, जिस पर दुनिया की सभी ज्ञान-परम्पराएं जांची-परखी जाने लगीं। यूरोप के ही एक चिंतक हाइडेगर ने इस प्रवृति को धरती का यूरोपीकरणकी संज्ञा दी है। प्रसंगवश, यदि हम पश्चिमी चिंतक जिजेक के हवाले से कहें, तो-‘‘इसमें कोई शक नहीं है कि हमारी सोच किसी न किसी स्थापित विचारधारा से निकलती है और हमारे जीवन का हर आयाम उससे प्रभावित होता है। जाने-अनजाने पूंजीवादी विचारधारा ने पिछले सौ वर्षों में समाज के हर आयाम को प्रभावित किया है। इसने न केवल सामान्य लोगों के दैनिक जीवन को अपने अनुसार ढाला है, बल्कि विरोध के हर स्वर को पूंजीवाद के समर्थन के स्वर में तब्दील कर दिया है।’’ 
आलोचनात्मक यथार्थवाद के प्रवर्तक रॉय भास्कर के अनुसार यथार्थ की एकांगी समझ के कारण चिंतन भी एकपक्षीय हो गया है। भौतिक सुखों के बहुतायत के बावजूद समाज घोर मानसिक संताप से गुजर रहा है। संचार के साधन बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य एकाकी होता जा रहा है। मनुष्य जीवन के सूक्ष्मतम अनुभवों से वंचित है। ऐसे में हिंसा, अपराध, आत्महत्या आम बात हो चली है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि इससे समाज तो हिंसक होगा ही, मानवता के लिए भी संकट उत्पन्न हो जाएगा।
यदि हम संचार के परिप्रेक्ष्य में विचारधारा की बात करें, तो पाएंगे कि विचारधारा एक संपूर्ण विश्व-दृष्टि को व्यक्त करने वाले सिद्धांत की तरह प्रयुक्त होता है, जबकि सिद्धांत को किसी विचारधारा की पूर्वपीठिका नहीं माना जा सकता है। वैसे यह विवाद का विषय है, लेकिन कई बार स्वयं संचार-माध्यमों की भी अपनी विचारधारा होती है। भारत के बारे में, ब्रिटेन के संचार-माध्यम की जैसी सोच है, वैसा ही रूस भी सोचे या अमेरिका भी इसी नजरिए से भारत को देखे, यह जरूरी नहीं। मार्क्स और एंगेल्स ने संचार-संबंधी जो अवधारणा प्रस्तुत की है, उनके अनुसार-‘‘संचार के लिए प्रस्तुत विचारों का संबंध सिर्फ चेतना से नहीं होता है। वह समाज की भौतिक स्थितियों से पैदा होते हैं। खुद चेतना का अस्तित्व भौतिक और स्थूल स्वरूपों से है। जो भी नया वर्ग अपने से पहले शासन करने वाले वर्ग के स्थान पर अपने को प्रतिष्ठित करता है, अपनी लक्ष्य सिद्धि की खातिर ही अपने हित को समाज के तमाम सदस्यों के समान हित के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बाधित होता है। यहां नए विचारों को इस रूप में प्रस्तुत करना होता है, जैसे यह किसी एक वर्ग के नहीं बल्कि पूरे समाज के विचार हैं।’’

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

किस्सा-ए-ईमानदारी

लेखक :-शिवेंदु राय 
प्रधानमंत्री मोदी अगर ईमानदार हैं तो उनसे कैसे निबटा जाए, यह आजकल की सबसे ज्वलंत समस्या है | तथाकथित राजनीति विज्ञान के विद्वान इस दिशा में पोथियाँ तैयार करने में लगे हैं | सभी राजनीतिक पार्टियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि मोदी की ईमानदारी अब विकराल रूप ले चुकी है |  इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि सभी पार्टियाँ इस सामयिक समस्या पर मिल बैठ कर विचार करे | ईमानदारी के विरुद्ध मैं भी चिंतन करने को तैयार हूँ | ये जानते हुये भी कि चिन्तन का विषय मैंने नहीं निर्धारित किया है, मेरे अपने फायदे या नुकसान से जुड़ा मसला नहीं है |
पहली कड़ी में आदत के विरुद्ध कजरौटे से दुश्मनी कैसे संभव है भाई | आज तक काजल की कोठरी में बैठने की आदत थी, अब काजल से परहेज हजम कैसे होगा | अगर मैं कहूँ कि प्रधानमंत्री अगर ईमानदारी के संत-ब्रांड है तो उनके विरोधी, चेलों की कला के बारे में लिखा गया चालीसा शुरू कर देंगे | और उनके चेले उस ईमानदारी को लछेदार शब्दों में बेवजह प्रतिभा का परिचय देते हुए नृत्य करने लगेंगे | जिसकी कोई जरुरत नहीं थी | अब ईमानदारी गई तेल लेने चर्चा शुरू होगी नृत्य पर |
दूसरी कड़ी नृत्य की है, जिसमें सभी पार्टीयों के नेता नृत्य का विश्लेषण करने के साथ, नृत्य की नयी कला का विकास करने का दावा ठोक देंगे | इस नृत्य के विकास से जनता को क्या मिला, ये लगातार पार्टी के प्रवक्ता लोग स्थापित करने में लग जाते हैं, जनता को विकसित नृत्य कब्ज की तरह दे कर ही मानते हैं |
तीसरी कड़ी में सत्ता पक्ष भारतीय सनातन संस्कृति की दुहायी दे कर नृत्य विकास के कई बिन्दुओं पर आपत्ति दर्ज करते हैं | आपत्ति तो बनती है , देश की जनता को चूतिया बनाने का सबसे आसान तरीका है भारतीय संस्कृति की दुहायी देना | व्यक्तिगत आजादी के नाम पर जैसे कम्युनिस्टों द्वारा जिम्मेदारिओं से बचा जाता रहा है | ठीक वैसे ही संस्कृतिनिष्ठ पार्टीयां भारतीय सभ्यता को लेकर घडियाली आंसू बहाती रहती है | यह मौसमी फसल है कभी-कभी ये लोग बे-मौसम भी फसल लगा लेते हैं |
चौथी कड़ी में अगर फसल अच्छी हुयी तो ईमानदार मोदी को ‘पूजीपतियों का दलाल’ वाला पुराना ठप्पा कम्युनिस्टों द्वारा लगा दिया जायेगा | कुछ चिरकुट पार्टियाँ ‘विदेशी हाथ’ वाला फ़ॉर्मूला फिट करने में लगी रहती है | सत्ता के ख़िलाफ़ आंदोलन हो तो सरकार या सत्ता द्वारा दिया जाने वाला ‘विदेशी फंडिंग’ वाला फ़ॉर्मूला सबसे ज्यादा हिट रहता है | और किसी पश्चिम देश ने गलती से भी तारीफ कर दी तो कम्युनिस्टों का ‘पूजीपतियों की दलाल है ये सरकार’ ये फ़ॉर्मूला सदाबहार होता है | ये सब फोर्मेट आज़ादी समय से ही चले आ रहे हैं |

पांचवी और अंतिम कड़ी में फोर्मेट और फ़ॉर्मूले की व्याख्या की जायेगी | जिसमें आरक्षण, संघ, कॉमुनिस्ट जीवन- शैली, गाँधी, अम्बेडकर, नेहरू, जातिवाद आदि पर चर्चा होगी | सबसे पहले आरक्षण की समीक्षा की जाएगी क्यूँ कि संघ चाहता है | वैसे समीक्षा के तरीके साहित्य वाले नहीं होंगे | इस विषय पर सभी पार्टिओं की ईमानदारी बिना रीढ़ वाली होगी | क्यूँ कि सत्ता सुख किसे नहीं भाता भाई | एक ईमानदारी जो रीढ़ के साथ खड़ी है उसके सामने संघ और अम्बेडकर को खड़ा किया जायेगा | सवाल कुछ इस तरह के होंगे, संघ में अभी तक कोई दलित सरसंघचालक क्यूँ नहीं बना | संध दलित विरोधी है | अम्बेडकर को संघ कैसे हथिया सकता है | आज कल हथियाने की होड़ लगी है इसमें कौन कितनी तेज़ी से हथिया रहा है | ये समय समय पर समझने और देखने का विषय है, खैर | संघ के विषय में कॉमुनिस्ट भी कूद पड़ते हैं लेकिन बेचारे पकड़े जाते हैं क्यूँ कि पोलितब्यूरों में भी तो अभी तक कोई दलित शामिल नहीं हुआ है | कॉमुनिस्ट लोग इस बात पर अड़े है ईमानदारी हम चलने नहीं देंगे | बेईमान भी नहीं होने देंगे | कदम कदम पर टंगड़ी मरेंगे | चाहे हमारी टंगड़ी ही क्यूँ न टूट जाये | बयान देंगे हम ईमानदार के विरुद्ध | रैलियां करेंगे | भाई किसी के साथ तो रहना होगा ईमानदारी या बेईमानी | खैर, गाँधी जी, अम्बेडकर जी आप लोग नाराज़ नहीं होना, तफरी में आप लोगों पर भी चिन्ता करने वाली बात बोल गया | 

किस्सा-ए-अवैध रिश्ता

कॉमरेड, डेढ़ साल से देश की तरह मेरे गाँव में भी बड़ी चकचक मची हुई है, शोर हुआ है और लोग यहां-वहां गाँव के लिए तथाकथित सार्थक बहस करते पाए गए हैं | जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं मेरे गाँव के सभी गेटकीपर वैज्ञानिक विधि से बातचीत करने लगे हैं | परन्तु इस घटना का एक अच्छा असर यह हुआ है कि देश की तरह मेरे गाँव के लोगों को भी काम मिल गया है | जो फालतू बैठे थे, वे शोर करने लगे है ,संपादक के नाम पत्र भी लिखने लगे है | नहर की पुलिया पर बैठ के मूडीज जैसी संस्थाओं की समीक्षा करने लगे हैं | आज तक जिनका अवैध संबंध भी नहीं था राजनीति से वो तकनिकी पहलुओं पर बतियाने लगे हैं | भाई अपने देश में परम्परा रही है बतियाने की, ज्वलंत प्रश्न है मोदी सरकार, शहर के लोग ही समीक्षा कर सकते है क्या? गाँव का भी तो हक़ बनता है ?
 राजेन्द्र जी का लड़का जहाज में सफ़र कर रहा है चाचा ! अरे भाई क्यूँ न करे पीएचडी कर रहा है सरकारी वजीफा जो मिल रहा है | मेरा भी तो लड़का कर रहा है उसको तो नहीं मिलता जहाज लायक वजीफा | साला, जब देखो मेरे से ही मांगता रहता है पापा ये, पापा वो | भाई तुम पीएचडी करा रहे हो अपने लौंडे को कोई साधारण बात नहीं है शोध कार्य , शोध कार्य आसान नहीं होता है बहुत घूमना पड़ता है ,ट्रेन से लेकर जहाज तक ,रेलवे प्लेटफार्म पर सोना भी पड़ता है ,फ़िल्में भी देखनी होती है | ऑब्जरवेशन के लिए पता नहीं और क्या-क्या करना होता है | अगर तुमको और ज्यादा जानना है तो लखनऊ वाले विकसवा से पूछ लेना | यार देश में क्या-क्या हो रहा है और तुम पीएचडी-फियेचडी के चक्कर में टाइम ख़राब कर रहे हो |
एक बात सुने हो कि नहीं ? नितिशवा ने शराब बंद कर दिया | सुने है भाई, बिपत की घड़ी है हम लोगों के लिए | मनोहर भाई हम लोगों को कौन रोक सकता है पीने से ,किस सरकार में दम है क्या ? आप चिंता क्यूँ करते हैं ,जमुआँव गाँव को पाटकर रख देंगे नूरी, लैला से | ठीक है भाई तुमसे इस गाँव को बहुते उम्मीद है |
लाल बाबु भाई कहाँ फंस गए हम लोग शराब के चक्कर में देश में और भी तो मुददे हैं | साला देश का प्रधानमंत्री हमेसा विदेशे में रहता है जब देखो , देश का विकास कैसे होगा ? इस दिशा में हम लोगों को सोचने की जरुरत है |आप लोग नाराज़ नहीं होंगे तो मैं भी एक बात बोलू ? बोलो भाई क्यूँ कोई नाराज होगा | क्यूँ ना हम वर्कशॉप लगा कर देश की चिंता करे | बबन तिवारी नाच पार्टी के सभी कलाकार बेकार बैठे हैं ,उनको भी बुला लेते हैं ,’सांस्कृतिक संध्या के साथ देश के लिए चिन्तन’ विषय रखते हैं | कैसा लगा आप लोगों को ये आईडिया ? बहुत बढ़िया गुलाब तुम तो छा जाने वाली बात बोले हो | पंडित जी आप नूरी लैला का जुगाड़ कर दीजियेगा | ठीक है ,कर दूंगा !
लाल बाबु आप ईमानदार किसको मानते हैं नितीश या मोदी को ? भाई मैं तो नितीश को ही मानता हूँ क्यूँ कि वो काला धन छुपाने विदेश तो नहीं जाता है | मोदी इतना विदेश क्यूँ जा रहे हैं इसके पीछे यही कारण है काला धन छुपाना |  रहने दीजिये आप मोदी विरोधी  है कुछ भी बकवास करते रहते हैं | मोदी विरोधी हूँ मैं तो आप राम मंदिर क्यूँ नहीं बनवा देते हैं | बनेगा मंदिर इंतजार कीजिये | आपके दादा स्वर्गीय हो गए मंदिर के इंतजार में अब आप बचे है | दादा का नाम न लीजिये बेकार हो जायेंगे आप, निपटा दूंगा आपको | देखियें आप कितना असहिष्णुता फैला रहे हैं | मोदी का विरोध किया तो हिंसा पर उतर आए | भाई आपको तो संसद में खड्गे जी ने देश का माना ही नहीं है,हम लोग सही मायने में देश के वासी है | खड्गे जी ने कल ही प्रमाण पत्र दिया है | लाल बाबु जी तो क्या हम अभी तक हवा में रह रहे हैं ? लगता है कल आपने राजनाथ जी को नहीं सुना, सही बात आप लोग सुनते कहाँ है | बस आलोचना करवा लो आपसे |
शर्मा जी आप देख लीजियेगा ,उत्तर परदेश में चुनाव में  मोदी को अपनी औकात पता चल जायेगा,राम मंदिर अगर नहीं बना तो 20 सीट भी मिलना मुश्किल हो जायेगा,दाल सब गुजरात भेज दिए है | दाल महंगा हुआ है इसके पीछे मोदी का हाथ है | आज मेरी गाय नहीं खा रही है जानते है क्यूँ ? साला चोकर गुजरात का बना हुआ है | उसमें खून मिला है, जानवर तो सब समझ जाते हैं |
आप दोनों लोग मेन मुद्दे से भटका रहे हैं देश को | आज भारत मैंच जीता है ,कोहली बहुत बढ़िया कप्तान बन गया हैं | अभी तक मैच हार रहे थे इसके पीछे कारण धोनी था, क्यूँ संतोष जी क्या कहते हैं आप ? मैं क्या कहूँ सचिन होता तो जीत का मजा ही अलग होता | वो भगवान है | आप लोगों को पता है अभी तक मैंच हार रहे थे मोदी के कारण, खेलने ही नहीं देते है खिलाडिओं को , सबको मेंटली डिस्टर्ब कर दिया है मोदी ने |

भाई अब भैंस दुहने का समय हो गया है मैं जा रहा हूँ | चाचा मैं भी चलता हूँ ,अब कल चर्चा नियत समय पर करेंगे |
v लेखक-शिवेंदु राय , मूलत: जमुआँव, जिला – सिवान (बिहार) के रहनेवाले। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से मीडिया विषय में परास्नातक की शिक्षा प्राप्‍त की | वर्तमान में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यलय में पीएचडी शोधार्थी (संचार एवं मीडिया) है | इसके साथ ही देश के तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादकीय पृष्ठों के लिए समसामयिक एवं वैचारिक लेखन | राष्ट्रवादी रुझान की स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय एवं विभिन्न विषयों पर नया मीडिया पर नियमित लेखन। इनसे shivendu_rai@yahoo.com एवं 08964028587 पर संपर्क किया जा सकता है |

किस्सा-ए-कम्युनिस्ट

कम्यूनिज्म तथा कम्यूनिस्टों के बारे में मुझे सबसे पहले अपने गाँव जमुआंव से ही पता चला था | उस दौर में भूमिहारों के घर कांग्रेसी या भाजपाई पैदा होते थे, डर के मारे कुछ लोग या यूँ कह सकते है कि ब्राह्मणों के चक्कर में भी राष्ट्रीय जनता दल यानि लालू जी के पाले में अवतरित हो जाते थे | हमारे टोले में कोई उतना पढ़ा लिखा नहीं था जो क्रांति की बात करता ,सब के सब सरकारी नौकर थे ,सत्ता के गुलाम लोगों का टोला था | गाँव में पक्के रूप में कहा जाये तो एक ही कॉमरेड थे ,सबको लाल सलाम कहते फिरते थे ,गाँव के चौक पर जय प्रकाश भाई का घर था | जब हम बच्चें लोग उनसे पूछते थे कि लाल सलाम का क्या मतलब है तो अक्सर बोल कर भगा देते थे कि तुम लोगों के समझ से बहार की चीज है | जब मैं छठी क्लास में पहुंचा तब दोस्तों के साथ हिम्मत जुटा कर उनसे पूछ बैठा, चक्कर क्या है कॉमरेड और लाल सलाम का ? पहले तो बोलने को तैयार नहीं थे बहुत ज़िद के बाद तैयार हुए, रिक्वेस्ट भी किया कि जो भी बोलूँगा हँसना नहीं है कॉमरेड तुम लोगों को, ध्यान से सुनना और जवाब देना है | बोलना शुरू किया ,जब कामरेडों की सरकार होगी तब सब कुछ हम लोगों के हाथ में होगा, व्यवस्था हमारे हाथ में होगी | सर्वहारा का शासन होगा | जिसकों जो चाहिए वो उसको वो चीज़ मिल जाएगी| श्याम बाबा सबसे बड़े थे उन्होंने बोला | हम लोगों को साईकल भी ! हा साईकल भी ! यहां तक कि लखराज बो को घर तक मिल जायेगा | भाई क्या क्या बताऊ ,मैं बहुत प्रभावित हो गया था कॉमरेड जयप्रकाश से | उन्होंने कहा कॉमरेड तुम लोग साथ दो हम क्रांति ला कर गाँव में रख देंगे | आठवीं क्लास के बाद मुझे तो बस देवेन्द्र बनिया का पैसा दिख रहा था जो जयप्रकाश ने उसकी तिजोरी में रखा मेरा हिस्सा दिखा दिया था | अब तो क्रांति हो कर रहेगी | अब दौर शुरू हुआ कॉमरेड बनाने का , मैंने बहुत से भूमिहारों और राजपूतों को बोला बन लो कॉमरेड मौका है | कुछ ने बहुत गालियाँ सुनायी और कुछ यानि 10 प्रतिशत भूख और प्यास मिटाने के लिए बन गये कॉमरेड | जो लोग नहीं बने कॉमरेड उनकों मैंने मान लिया था वो जाहिल लोग है ,अनपढ़ है जब ज्ञान होगा तो जरुर कॉमरेड बनने मेरे पास आयेंगे | अनपढ़ लोगों में मेरी दुकान चल निकली थी,हिंदी के मुश्किल शब्दों से मैंने अपनी दुकान सजा राखी थी, सबकों लालच देता रहा ,क्या बताऊँ भाई लाईन लगी थी कॉमरेड बनने की | सबको कुछ न कुछ चाहिए थे किसी को गाय,घोडा, मोबाईल,बाईक, बकरी,जर्सी, गाय,खाद आदि | सबको मैं पब्लिक डिमांड पे देने लगा था | मेरी पार्टी में आने वाले मेम्बरान की संख्या दोगुनी हो गई थी | कॉमरेड बनने के बाद जिसकों जो चाहिए वो मेरे घर आने लगा |
रामनाथ गोंड को साईकल चाहिए था तो रोज घर पे आने लगा था ,पिताजी अब नाराज होने लगे थे, |रोज सुबह से शाम तक लगभग 500 लोगों को लाल सलाम बोलने लगा था,इससे ज्यादा लोग मुझे बोलने लगे थे | नहाना और दाढ़ी बनाना बंद ही कर दिया था जब माँ बोलती थी तो कहने लगा था कि देश खतरें में है, तुमकों नहाने की पड़ी है |
जो लोग मेंबर नहीं थे उसकों यहीं बोलता रहा पहले मेंबर तो बन जाओ कॉमरेड,  फिर बात करते हैं | प्रेम गोंड और तपेसर राम ने कहा कि बाबु मुफ्त की चीज़ मिल रही है जवनी पार्टी में जोड़ना है जोड़ दी हमका |

पंचायत के सभी निकक्मों को अपनी पार्टी में खपा दिया था मैंने | सब रोज सुबह-शाम लाल सलाम, कॉमरेड, सर्वहारा,अधिनायकवाद बोलते रहते थे | सबकी नज़र देवेन्द्र बनिया और मैरवा के शाही लोगों पर थी| कुछ ही दिन बाद मैरवा में भी सीपीआईएम का दफ़्तर खुल गया था अब हमारी बैठकी वही लगने लगी थी, सभी निठल्लों की फ़ौज तैयार थी क्रांति के लिए, लेनिन और स्टॅलिन हमारे आदर्श हो गए | दीवारों पर रोज देखने लगा था | दादा स्वर्गीय शिवसागर राय का सूद वाला धंधा मैंने मंदा कर दिया था | उनके सूद के पैसे मैं माफ़ कराने लगा था | कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि मेरे कॉमरेड गुरु जयप्रकाश जी जेल चले गए | आरोप यह था कि उनके घर से बड़ी मात्र में हथियार बरामद हुआ था | ये भी पता चला कि वो अनपढ़ थे | कॉमरेड क्या बोलूं अब धीरे-धीरे सबकी पोल खुलने लगा थी, सभी शराबिओं का मंच खड़ा कर रखा था मैंने | जिस तरह से सोवियत रूस का विघटन हुआ था उसी तरह हमारे नसेड़ी-गजेडी कम्युनिस्ट पार्टी का विघटन हो गया | आज कल मैं भाजपाईयों से ज्यादा प्रभावित हूँ !

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

वर्तमान समय में ई बुक्स की उपयोगिता का अध्ययन

प्रस्तावना
कहते हैं कि किताबें ही आदमी की सच्ची दोस्त होती हैं, जमाना बदल रहा है ..लोगों के पास समय की कमी होती जा रही है | किताबों को पढने का भी तरीका परिवर्तित हुआ है | अब जमाना डिजिटल है तो किताबें भी डिजिटल हुईं  |
ई-पुस्तक (इलैक्ट्रॉनिक पुस्तक) का अर्थ है डिजिटल रुप में पुस्तक । ई-पुस्तकें कागज की बजाय डिजिटल संचिका के रुप में होती हैं जिन्हें कम्प्यूटर, मोबाइल एवं अन्य डिजिटल यंत्रों पर पढ़ा जा सकता है । इन्हें इण्टरनेट पर भी छापा, बांटा या पढ़ा जा सकता है । ये पुस्तकें कई फाइल फॉर्मेट में होती हैं जिनमें पीडीऍफ (पोर्टेबल डॉक्यूमेण्ट फॉर्मेट), ऍक्सपीऍस आदि शामिल हैं, इनमें पीडीऍफ सर्वाधिक प्रचलित फॉर्मेट है । ई-पुस्तको को पढ़ने के लिए कम्प्यूटर (अथवा मोबाइल) पर एक सॉफ्टवेयर की आवश्यकता होती है जिसे ई-पुस्तक पाठक (eBook Reader) कहते हैं । पीडीऍफ ई-पुस्तकों के लिए ऍडॉब रीडर तथाफॉक्सिट रीडर नामक दो प्रसिद्ध पाठक हैं । ई-बुक के सस्ता होने का कारण यह है कि इन पर पहली बार आने वाली लागत के बाद अमूमन कोई लागत नहीं आती । एक बार ई-बुक विकसित और प्रकाशित होने के बाद लेखक उसकी अनंत फाइलें बनाने के लिए स्वतंत्र है । इसलिए लेखक की लागत बहुत कम होती है और इसका लाभ पाठक तक पहुँचता है । भारत में भी ई-बुक्स का ट्रेंड तेजी से जोर पकड़ रहा है और अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भी ई-बुक्स खूब दिखने लगी हैं । दिल्ली में सितंबर 2012 में हुए विश्व प्रसिद्ध दिल्ली पुस्तक मेले में ई-बुक को मुख्य थीम बनाकर भारतीय प्रकाशकों के संगठन ने भी ई-बुक्स में अपनी रुचि प्रकट की है । यह एक नए क्षेत्र में उभरते हुए अवसरों का भी संकेत है । मेज़न का किंडल (kindle) और सोनी का ई-बुक रीडर काफी लोकप्रिय हैं। हालाँकि ई-बुक पढ़ने के लिए खास तौर पर ई-बुक रीडर खरीदने की जरूरत नहीं है और आप अपने कंप्यूटर, लैपटॉप या टैबलेट पर भी इनका आनंद ले सकते हैं।
ई-पुस्तक बनाने के दो तरीके हैं।
·         कम्प्यूटर पर टाइप की गई सामग्री को विभिन्न सॉफ्टवेयरों के द्वारा ई-पुस्तक रुप में बदला जा सकता है।
·         छपी हुई सामग्री को स्कैनर के द्वारा डिजिटल रुप में परिवर्तित करके उसे ई-पुस्तक का रुप दिया जा सकता है।

उद्देश्य :
कहते हैं कि किताबें ही आदमी की सच्ची दोस्त होती हैं, जमाना बदल रहा है ..लोगों के पास समय की कमी होती जा रही है | किताबों को पढने का भी तरीका परिवर्तित हुआ है | अब जमाना डिजिटल है तो किताबें भी डिजिटल हुईं  | शोध के द्वारा यह जानने का प्रयास किया गया है कि पुस्तकों का डिजिटल रूप पाठकों और छात्रों के बीच किस तरह से स्थापित हो रहा है तथा इससे पाठकों को क्या लाभ मिल रहा है | ई पुस्तकों का पाठक वर्ग किस तरह का है | इसकी उपयोगिता क्या है ? किताबों के विकल्प के रूप में ई बुक्स के महत्व को समझाना है |
शोध प्राविधि :
इस शोध को पूर्ण करने के लिए  फोकस ग्रुप स्टडी विधि का उपयोग किया है | इसके लिए  सुविधानुसार निदर्शन पद्धति से माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के स्नातकोत्तर एवं एमफिल कक्षा के ऐसे दस छात्र और दस छात्राओं का समूह बनाया जो ई बुक्स का प्रयोग कर रहे हैं | इस समूह के बीच इस मुददे को लेकर वाद विवाद परिचर्चा कराया गया | इस दौरान इनके हर मुददे को अंकित किया गया | साथ में कुछ सवाल भी किया गया ई बुक्स को लेकर | इसके अलावा दिल्ली विश्वविध्यालय के प्रोफ़ेसर डॉ हरीश  और जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविध्यालय दिलीप शक्य का साक्षात्कार किया गया | दोनों ही प्रोफ़ेसर ई बुक्स का प्रयोग करते हैं तथा ई बुक्स के जानकार है | इनका साक्षात्कार इस लिए लिया गया कि ई बुक्स के पढ़ने वालों की प्रवृति के बारे में जाना जा सके |
विश्लेषण :
परिचर्चा और साक्षात्कार के दौरान जो बातें निकल कर सामने आयी उसमें पता चला कि जो लोग किताबों से दूर चले गए थे वो अब ई बुक्स के माध्यम से किताबों को पढ़ने लगे हैं | तथा किताबों को सहेजने और उनकों संचय करने कि चिंता को दूर किया है ई बुक्स ने | जिससे हर तबका लाभान्वित हुआ है | किताबों को छात्र अब बोझ नहीं समझता है | इसके अलावा परिचर्चा में अन्य कई महत्वपूर्ण तथ्य निकल कर आये जो निम्नलिखित है :-
·       जो युवा वर्ग तकनिकी रूप से सक्षम है उसके लिए वरदान की तरह है | चाहे वह कोर्स बुक्स हो या अन्य तरह की जानकारी वाली पुस्तकें हो | किताबें अब एक क्लीक में मोबाईल या टैब पर साथ हो लेती है जिससे पाठक हर समय अपने आप को किताबों से जोड़े रखता हैं |
·       जो युवा वर्ग किताबों को तकियानूसी समझाता था जिसके लिए लाईब्रेरी में बैठ कर किताबों का अध्ययन करना बहुत मुश्किल था | ई बुक्स के आ जाने से उस वर्ग में से बहुत अच्छे पाठक और लेखक उभर कर आये है |
·       ई बुक ऐसी तकनीकी किताब है, जो लेखक, प्रकाशक और पाठक सभी के लिए फ़ायदे का सौदा है। हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक ई-प्रकाशक के माध्यम से अपनी ई-बुक्स प्रकाशित करवा सकते हैं। ई-प्रकाशक की शुरूआत विशेष तौर पर इन्हीं भाषाओं को ध्यान में रखते हुए हुई है क्योंकि इन्डिक यूनिकोड से संबंधित जटिलताओं की वजह से आज भी हिंदी में ई-बुक्स का प्रकाशन चुनौतीपूर्ण है। अलबत्ता, ई-प्रकाशक इन सभी चुनौतियों को तकनीकी रूप से सुलझाने और आकर्षक इंडिक ई-बुक्स के प्रकाशन में सक्षम है।
·       इस परिचर्चा में एक बड़ी बात सामने निकल कर ये आयी कि अभी भी ई बुक्स के पढ़ने वालों में एकाग्रता की कमी होती है तथा वो अपने विषय को बेहतर नहीं समझ पते हैं |
·       एक बात और सामने निकल कर आयी कि पाठकों को ई पुस्तकों को पढ़ने में ज्यादा मज़ा नहीं आता है | ई बुक्स के पाठक भी प्रिंट किताबों को ही बेहतर मानते हैं |
·       एण्ड्रॉय्ड तथा आईओएस आदि टैबलेट आ जाने से प्रयोग और सुगम हुआ है। अब एक अलग डिवाइस नहीं लेनी पड़ती, एक टैबलेट में ही सब कार्य हो जाते हैं चाहे वह ईमेल अथवा नेट सर्फ़िंग हो या चैट अथवा गेमिंग या फिर किताबें पढ़ना। एक डिजिटल कन्ज़्यूमर के लिए उत्तम कन्वर्जेन्स (convergence) |
·       पहले जहाँ बरिस्ता आदि में किताब पढ़ते कई लोग मिल जाते थे परन्तु ई-बुक पढ़ता कोई न दिखता था वहीं आजकल एकाध लोग दिख जाते हैं टैबलेट अथवा ई-बुक रीडर पर पढ़ते हुए | समय के साथ यह चलन और बढ़ेगा तथा और अधिक लोग ई-बुक्स को अपनाएँगे |
·       ई-बुक्स ने बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है। किताबों की बिक्री घट रही है। पुस्तक-स्टेशनरी का व्यापार भी डोलने लगा है। अब विद्यार्थी केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के बुक्स खरीदते हैं। पढ़ने या लायब्रेरी के लिए साहित्य आदि की किताबें स्टालों में धुल खाती पड़ी रहती हैं।
·       आज कल हिन्दी-अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में भी पुस्तकें-कविताएं सहित समूचा साहित्य इंटरनेट पर उपलब्ध है। यह उन लोगों के लिए वरदान है जो देख नहीं सकते । ई-बुक्स को सिर्फ पढ़ा नहीं बल्कि सुना भी जा सकता है। बुक्स अंतर्गत आप विश्व के नामचीन लेखकों-उपन्यासकारों, विचारकों, वैज्ञानिकों की रचनाएं सामग्री पढ़-सुन सकते हैं । 
·       आज समय बदल चुका है, लोग बाजार में किताबें ढूंढना-खरीदना नहीं चाहते हैं। बाजार के बुक स्टालों तक पहुंचने वाले पाठक वर्ग की संख्या गिनती की बची है। कहा जाता था कि 'ये तो किताब का कीड़ा है।' अब ये शब्दों से बना वाक्य इतिहास में कैद हो गया। एक दौर था जब लोग लेखक-उपन्यासकारों के नये अंक-एडीशन के लिए लंबा इंतजार किया करते थे । बड़े-छोटों सभी को पुस्तकों के लिए डाकघर के चक्कर लगाने पड़ते थे । पुस्तकों को पढ़ने का एक जुनून होता था। अब लोग इंटरनेट पर ही किताबों को पढ़ना ज्यादा पसंद करने लगे हैं । 

 निष्कर्ष
ज्ञान का खजाना कहे जाने वाली लाइब्रेरी की दुनिया आज कुछ जुदा अंदाज में हमारे सामने है। वक्त के साथ जो स्वरूप बदला वो है- ई-बुक्स की दुनिया। संजय बारू की द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर हो या फिर चेतन भगत की रिवोल्यूशन-2020, सुई मोंक किड की द इन्वेंशन ऑफ विंग की बात करें या फिर रेंसम रिग्स की हेल्लो सिटी की, ई-बुक्स की दुनिया में इन किताबों ने धूम मचाई। बुक्स स्टॉल पर पहुंचने से पहले ही इंटरनेट के जरिए यह किताबें पाठकों के बीच पहुंच गईं।
कुल मिलाकर कहा जाए तो लाइब्रेरी की दुनिया से बाहर निकलकर पाठक ई-बुक्स की दुनिया की लाइब्रेरी पंसद कर रहे हैं। सूई मोंक किड की द इन्वेंशन ऑफ विंग की बात करें तो कुछ महीने में ही एक लाख से अधिक लोगों ने इस किताब को इंटरनेट पर पढ़ा है। रेंसम रिग्स की हेल्लो सिटी को भी जमकर सराहना मिली। संजय बारू की द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर भारत के साथ पूरी दुनिया में पढ़ी गई।

संदर्भ ग्रंथ सूची
1.    Catherine C. Marshall, Reading and Writing the electronics books, Morgan and Claypool Publishers, 2009.
2.    टक्साली कांत रवि, इंटरनेट एवं ईमेल, टाटा मैक्ग्राहिल, 2010.
4.    अब आया ई-पुस्तकों का जमाना, न्यूज़ इन हिन्दी। 27 जनवरी, 2009.
5.    जोशी संदीप, ई-बुक रीडर, हिन्दुस्तान लाइव, 10 फ़रवरी 2010.
6.     -बुक क्या है, eprakashak.com/what_is_ebook.html