गुरुवार, 9 नवंबर 2017

वर्चुअल रिएलिटी

क्‍या है वर्चुअल रिएलिटी - 
वर्चुअल रिएलिटी एक ऐसी अाभासी दुनिया है जिसे कंप्‍यूटर सॉफ्टवेयर द्वारा बनाया जाता है, लेकिन आप इसका हिस्‍सा बन सकते हैं। वर्चुअल रिएलिटी का अनुभव लेने के लिये दृष्टि और ध्वनि का प्रयोग किया जाता है। जिन गेम्‍स को आप अब तक मोबाइल और कंप्‍यूटर पर खेला करते थे, वर्चुअल रिएलिटी के माध्‍यम से आप उनका हिस्‍सा बन सकते हैं। यह उससे भी कहीं आगे हैं। आप कमरे में बैठे-बैठे अंतरिक्ष की याञा पर जा सकते हैं। किसी कार को ड्राइव कर सकते हैं। गेंमिग की दुनिया में वर्चुअल रिएलिटी ने कमाल कर दिया है। इस नकली संसार को वास्‍तविक बनाने के लिये गेम डेवलपर्स ने कृत्रिम रूप से द्रश्‍य, आवाज, स्पर्श और गंध को शामिल किया है। जिससे वर्चुअल रिएलिटी गेम्‍स और भी वास्‍तविक लगते हैं। यूट्यूब पर 360 डिग्री वीडियो वर्चुअल रिएलिटी पर ही अाधारित हैं।

घर पर कैसे लें वर्चुअल रिएलिटी का अनुभव
अगर आप वर्चुअल रिएलिटी का अनुभव लेना चाहते हैं तो बस अापको खरीदना होगा गूगल कार्डबोर्ड यह बहुत ही सस्‍ता वर्चुअल रिएलिटी डिवाइस है जो आपके मोबाइल फोन के साथ जुडकर आपको वर्चुअल रिएलिटी की दुनिया में ले जायेगा। वीआर कार्डबोर्ड गूगल द्वारा लाॅन्च किया गया वर्चुअल रियालिटी प्लेटफाॅर्म है। इस कार्डबोर्ड से अाप घर में ही मोबाइल में एंटरटेनमेंट, वर्चुअल टूअर, एजुकेशन और वर्ड टूरिज्म का मजा ले पायेगें।

वीआर कार्डबोर्ड एप्स
साथ ही मोबाइल पर मजा लेने के लिये आपको डाउनलोड करनी होगी वीआर कार्डबोर्ड एप्स जो खासतौर पर गूगल कार्डबोर्ड के लिये डिजायन की गयी हैं।


·                     Google Cardboard डाउनलोड कीजिये, यह एप्‍लीकेशन अापको गूगल प्‍ले स्‍टोर से मिल जायेगी । इससे अाप गूगल अर्थ, स्‍ट्रीट व्‍यू और यूट्यूब 360 वीडियो का शानदार अनुभव प्राप्‍त कर पायेंगे।
·                     अगर आपको स्‍पेस में जाना चाहते हैं तो डाउनलोड कीजिये Titans of Space, यह आपको घर बैठे बैठे अंतरिक्ष की याञा पर ले जायेगा। 
·                     अगर आपको डायनोसोर से प्‍यार है तो यह एप्‍प आपके लिये ही बना है इसका नाम है Jurrasic VR। 
·                     समु्द्री की गहराईयों की सैर करने के लिये आप Fish Schooling को डाउनलोड कर सकते हैं। 
·                     और अगर कभी रोलर कोस्टर पर नहीं बैठे और उसका अनुभव करना चाहते हैं तो डाउनलोड कीजिये VR Roller Coaster। 

Virtual Reality VR हेड सेट की पूरी जानकारी
सबसे पहले हम बात करते है Virtual Reality का क्या मतलब है , रियल्टी मतलब की वो रियल है सच में है और Virtual मतलब कि सिर्फ दिखने में ही रियल है . अब Virtual Reality हेडसेट क्या होता है कि एक तरह का चस्मा मान लीजिए जिस पहने के बाद जो आपको उसके अंदर दिखाई देगा उस से आपको लगेगा की आप उस जगह पर है जो उस हेडसेट के अंदर दिख रही लेकिन असल में आप वंहा पर नहीं होंगे सिर्फ आपको महसूस होगा की आप वंहा है .
जैसा की फोटो में आप देख सकते है पहला फोटो है वो रियल है जंहा पर ये लड़की रियल में है लेकिन हेडसेट लगने के बाद उसे लग रहा है की वो कंही और है जैसा की दूसरी फोटो में दिखाया गया है.
अब बात करते है कि हेडसेट कितने टाइप के होते है और सब में क्या खास बात है , ये हेडसेट कई तरह के होते है. कुछ को पावर सप्लाई की जरूर होती हती जैसा की फोटो में दिखाया गया कुछ सिंपल होते है जो की मोबाइल के लिए होते है और उनको किसी भी एक्सटर्नल पावर सप्लाई की जरूरत नहीं पड़ती .
इन हेडसेट में सिर्फ आपको अपना मोबाइल लगाना है और आप इसका मजा ले सकते है ,Youtube पर आपको 360 Degree ki Videoमिल जाएगी . जिस अगर आप इस हेडसेट की मदद से देखोगे तो आपको अचे से पता चलेगा कि असल में Virtual realty क्या होता है .
मानलो आप अगर इस VR हेडसेट से किसी जगह की वीडियो देख रहे है जो की 360 डिग्री की विडियो है तो आपको लगेगा की आप उसी जगह पर हो क्योंकि 360 डिग्री की वीडियो में आपको लेफ्ट राइट टॉप टू बॉटम सब कुछ दिखाई देता है और इस वर हैसेट से ओ सब आप बड़ी ही आसानी से देख सकते है .

 Virtual Reality VR Head Set का इतिहास

Virtual Realtyकी शुरुआत गूगल कार्डबोर्ड से हुई थी .जैसा की नाम से ही पता चल रहा की ये कार्डबोर्ड से बना है , इसमें दो लेंस भी लगे हुए है और इस कार्डबोर्ड के सामने मोबाइल को लगाना पड़ता था और मोबाइल की स्क्रीन दो हिस्सो में बंट जाती है एक लेफ्ट और राइट क्योंकि इसमें दो लेंस है और हमें दोनों आँखों से देखना पड़ेगा.
लेकिन अब मार्किट में आपके बहुत तरह के VR हेडसेट मिल जायेंगे 200 रूपए से लेकर 10000 से भी ज्यादा कीमत के. कीमतइन की क्वालिटी के ऊपर डिपेंड है की कितना बढ़िया वर हेडसेट है , कार्डबोर्ड वाला आप्को 200 से 500 तक का मिल जायेगा और प्लास्टिक वाला आप्को 1000 से ऊपर मिलेगा और भी है जो आपको 10000 तक मिलेंगे . कुछ बढ़िया VR हेडसेट के नाम मैं बता देता हू जैसे Gear VR , Oculus Company के VR हेडसेट बहुत बढ़िया है और ये कंपनी वर पर बहुत सालों से काम भी कर रही है .

VR हेड सेट किस मोबाइल में सपोर्ट करता है


VR headset लगभग सभी एंड्राइड फ़ोन में काम करता है कुछ फ़ोन के साथ में ही VR का आप्शन आता है और कुछ में आप third पार्टी app को इनस्टॉल करके VR headset का इस्तेमाल कर सकते है .इसके लिए आप Google Play स्टोर पर VR app सर्च करके डाउनलोड एंड इनस्टॉल कर सकते है .

कन्वर्जेंस मीडिया

आधुनिक तकनीकों का संगम ही कन्वर्जन्स है। प्रसारण, केबल, कम्प्यूटरिंग, मल्टीमीडिया, नेटवर्क, उपग्रह, दूरसंचार का सम्मिश्रण कन्वर्जन्स अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का वरदान है जिसने विश्वग्राम का स्वप्न चरितार्थ किया है। सन् 1939 में न्यूयार्क के एक मेले में एक टेलीविजन का सेट प्रदर्शित किया गया जो टीवी, रेडियो, रिकॉर्डर, प्लेबैक, फैक्स तथा प्रोजेक्टर का मिश्रण था। ऑडियो, वीडियो तथा डेटा को एक ही सूत्र में पिरोकर एक ही माध्यम द्वारा एक ही स्रोत से उपलब्ध करा पाने में सक्षम प्रक्रिया को ही कन्वर्जेन्स कहा जाये तो उचित है।

      कन्वर्जेन्स टेलीकम्यूनिकेशन, ब्रॉडकास्टिंग तथा कम्प्यूटर नेटवर्किंग को सम्मिलित कर एक ऐसे एकल डिजिटल नेटवर्क का निर्माण करता है जिसके द्वारा उपभोक्ता की आवश्यकताएं- टेलीफोन, फैक्स, टेलीविजन, इंटरनेट, वीडियोफोन, मूवी, संगीत, मनोरंजन आदि एक ही स्रोत से पूरी की जाती है।

      कन्वर्जन का प्रमुख उद्देश्य उपलब्ध विभिन्न जनोपयोगी तकनीकों को समेकित कर एक ऐसे एकल मध्यम द्वारा उपभोक्ताओं तक पहुंचाना है जिस पर कन्वर्जेंन्स की सहायता से विभिन्न सेवाएं एक साथ प्रदान की जा सकें। इसके अतिरिक्त डिजिटल मनोरंजन भी इसका एक प्रमुख हिस्सा है। अब जो कन्वर्जेन्स तकनीक प्रचलन में है उसमें इंटरनेट द्वारा वीडियो, मूवी, संगीत आदि का लुत्फ अपने होम थियेटर यानी कम्प्यूटर पर लिया जा रहा है।

      1980 से 1990 तक के दशक को संचार का दशक कहा जाये तो 1991 से 2000 तक के दशक को सूचना क्रान्ति का दशक कहा जा सकता है। इसी तरह 2001 से 2010 तक के दशक को इलेक्ट्रानिक कन्वर्जेन्स (ई-कन्वर्जेन्स) कहा जायेगा, क्योंकि इसमें कई प्रकार की सेवाओं का पूरे तालमेल के साथ समन्वय हो जाएगा। कन्वर्जेन्स का अर्थ है  सभी स्तरों पर परिवर्तन यानी टेक्नोलॉजी, अंतर्वस्तु, प्रसार-क्षेत्र और विपणन जैसे विीन्न क्षेत्रों में बदलाव। कन्वर्जेन्स को सूचना समाज के निर्माण में सहायक माना जाता है, इसमें समाज पर दूरगामी प्रभाव डालने की क्षमता है।

      विभिन्न टेक्नोलॉजी को समन्वित रूप् से एक ही लक्ष्य की दिशा में अभिमुख कर सूचना टेक्नोलॉजी और प्रसारण सेवाओं को एक ही चैनल यानी सरणि से ग्राहकों व उपयोगकर्ताओं तक पहुंचाया जा सकता है। एक जमाना था जब एक टेक्नोलॉजी का केवल एक उपयोग संभव था, यह उपयोगी भी किसी खास कार्य के लिए किया जाता था, परम्परा से ही विभिन्न संचार माध्यमों का अपना अलग-अलग अस्तित्व रहा है। प्रसारण, टेलीपफोन और ऑनलाइन कम्प्यूटर सेवाओं का अपना-अपना अलग दायरा था, ये अलग-अलग नेटवर्क पर कार्य करते थे और इनमें विभिन्न प्लेटफार्म यानी मंचों का उपयोग होता था।

      कन्वर्जेन्स तीन मुख्य धाराओं से मिला होता है-
      1.  कंटेन्ट- आडियो, वीडियो, डेटा इत्यादि ... सूचना व मनोरंजन;
     2. प्लेटफार्म- पीसी, टीवी, इंटरनेट उपकरण, मोबाइल, फोन इत्यादि, ...प्लेटफार्म या उपकरण जिस पर उपभोक्ता कंटेन्ट प्राप्त करता है।
    3. वितरण या डिस्ट्रीव्यूशन- कंटेन्ट को उपभोक्ता उपकरणों (प्लेटफार्मो) पर पहुंचाने के लिए वितरण माध्यम।

     कन्वर्जेन्स के विकास में मनोरंजन या इंटरटेरमेंट कंटेन्ट महत्वपूर्ण है। वर्ल्ड वाइड वेब ने इस बात की आवश्यकता पर बल दिया कि किस प्रकार इसे कम्प्यूटरों के दायरे से निकाल कर मोबाइल फोन या टेलीविजन सेट पर भी पहुंचाया जाए, साथ ही तकनीकी विकास की उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण इसने नये-नये अप्लीकेशनों द्वारा नये-नये मार्ग खोले; इसने कन्टेन्ट (डेटा, वीडियो, आडियो आदि) के नियंत्रण से लेकर पैकेजिंग तक के कार्य के लिए अनेक आयाम उत्पन्न कर दिये; उपभोक्ता वांछित संगीत आसानी से डाउनलोड कर मुफ्त में सुन सकता है। परंतु अब कन्वर्जेन्स में कनटेन्ट की अपेक्षा प्लेटफार्म (कम्प्यूटर, टीवी सेट, मोबाइल पफोन तथा अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों) की उपलब्धता ने उपभोक्ताओं के समक्ष चयन की गुंजाइश प्रदान की है। जैसे-जैसे कन्वर्जेन्स विकसित हो रहा है वैसे-वैसे लोग अपनी-अपनी रणनीति निर्धारित कर रहे हैं।


     मीडिया तथा संचार तकनीकों के साथ-साथ इलेक्ट्रानिक उद्योग में आए तकनीकी परिवर्तनों ने कन्वर्जेन्स की अवधारणा को साकार रूप दिया है। सूचना, संगीत, मनोरंजन या ध्वनि आदि को प्रसारित करने क लिए एक ऐसे एकल माध्यम की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है, जिसके द्वारा गुणवत्तायुक्त सूचना, वीडियो, ऑडियो आदि को उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा सके। कन्वर्जेन्स ने टेलीकम्प्यूनिकेशन, आईटी और ब्रॉडकास्टिंग तकनीकां का समागम कर उद्योग जगत के साथ-साथ उपभोक्ताओं को नये अवसर प्रदान किये हैं। भारत में कन्वर्जेन्स की दिशा में सकारात्मक प्रयास जारी हैं, जिसमें कसरकार द्वारा जारी कन्वर्जेन्स बिल- 2000 अत्यन्त महत्वपूर्ण है। कन्वर्जेन्स ने आम उपभोक्ता की जीवनचर्या में अभूतपूर्व परिवर्तन लाने के साथ-साथ विभिन्न सेवाओं को एक ही माध्यम पर सस्ते दामों पर उपलब्ध कराने की आशा उत्पन्न की है।

इंटरनेट पत्रकारिता

इंटरनेट  पर समाचारों का प्रकाशन या आदान-प्रदान इंटरनेट पत्रकारिता कहलाता है। इंटरनेट पत्रकारिता दो रूपों में होती है। प्रथम-समाचार संप्रेषण के लिए नेट का प्रयोग करना । दूसरा- रिपोर्टर अपने समाचार कोई-मेल  द्वारा अन्यत्र भेजने  व  समाचार को संकलित करने  तथा  उसकी सत्यता,विश्वसनीयता सिद्ध करने तथा उसकी सत्यता, विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिएकरता है।
   इंटरनेट पत्रकारिता का इतिहास:
   विश्व-स्तर पर इंटरनेट पत्रकारिता का विकास निम्नलिखित चरणों में हुआ-
    (१) प्रथम चरण------- १९८२ से १९९२
    (२) द्वितीय चरण------- १९९३ से २००१
    (३) तृतीय चरण------- २००२ से अब तक
 भारत में इंटरनेट पत्रकारिता का पहला चरण १९९३ से तथा दूसरा चरण  २००३ सेशुरू माना जाता है। भारत में सच्चे अर्थों में वेब पत्रकारिता करने वाली साइटें ’रीडिफ़डॉट कॉम’, इंडिया इफ़ोलाइन’ व ’सीफ़ी’ हैं । रीडिफ़ को भारत की पहली साइट कहाजाता है ।  वेब साइट पर विशुद्ध पत्रकारिता  शुरू करने का श्रेय  ’तहलका डॉट्कॉम’को जाता है।

हिंदी में नेट पत्रकारिता ’वेब दुनिया’ के साथ शुरू हुई। यह हिन्दी का संपूर्ण पोर्टल है।  प्रभा साक्षी  नाम का अखबार  प्रिंट रूप में न होकर सिर्फ़ नेट पर ही उपलब्ध है।आज पत्रकारिता के लिहाज से हिन्दी की सर्व श्रेष्ठ साइट बीबीसी की है, जो इंटरनेटके मानदंडों के अनुसार चल रही है। हिन्दी वेब जगत में ’अनुभूति’, अभिव्यक्ति,हिन्दी नेस्ट, सराय आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ भी अच्छा काम कर रही हैं।  अभीहिन्दी वेब जगत की सबसे बडी़ समस्या मानक की बोर्ड तथा फ़ोंट  की है । डायनमिक फ़ौंट  के अभाव के कारण हिन्दी की ज्यादातर साइटें खुलती ही नहीं हैं ।


आधुनिक  युग में इंटरनेट पत्रकारिता ने सूचना संप्रेषण के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इंटरनेट आज सूचना प्रौद्योगिकी का केंद्र बिंदु बन गया है। इंटरनेट के माध्यम से प्रदान किए जाने वाले समाचारों को इंटरनेट पत्रकारिता कहा जाता है। वर्तमान समय में आज प्रत्येक समाचार पत्र रेडियो, इलेक्ट्रानिक मीडिया चैनल, समाचार एजेंसियों की  अपनी वेबसाइटें हैं, जिनमें हम न केवल देश-विदेश की खबरें पढ़ सकते हैं, बल्कि हर मिनट के बाद हर ताजा घटना की आसानी से जानकारी ले सकते हैं। इंटरनेट जर्नलिज्म के इस युग में यदि हम पूरे विश्व को ‘ग्लोबल विलेज’ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से हम 365 दिनों में हर मिनट के बाद देश-विदेश की ताजा घटना की निरंतर जानकारी हासिल कर सकते हैं। इस दोहरे संचार के माध्यम से मीडिया लोगांे की किसी मुद्दे पर तुरंत फीडबैक भी प्राप्त कर सकती है।

मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

नेहरू की नज़र में देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति के योग्य नहीं थे

आजादी के बाद देश को पहला राष्ट्रपति देने के लिए सिवान आज जो गर्व का अनुभव करता है, इसका पूरा श्रेय सरदार बल्लभ भाई पटेल को जाता है। पं. जवाहरलाल नेहरू ने तो ठान लिया था कि जैसे भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति नहीं बनने देना है लेकिन बल्लभ भाई पटेल को ऐसे ही सरदार की उपाधि नहीं मिली। वे इतने असरदार थे कि पं. नेहरू की इच्छा सिवान की धरती पर जन्मे, यहां की मिट्टी में लोट-पोटकर बड़े हुए राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति बनवाकर ही दम लिया।
जीरादेई निवासी बच्चा ¨सह तथा जेपी सेनानी महात्मा भाई ने बताया कि राजेंद्र बाबू को जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रपति नहीं बनाना चाहते थे। जब औपबंधिक राष्ट्रपति नियुक्त करने की बात चल रही थी, तब नेहरू ने सी राजगोपालाचारी का नाम प्रस्तावित कर दिया था, जिसका अनुमोदन खुद डॉ.राजेंद्र प्रसाद करने के लिए उठ गए थे लेकिन सरदार पटेल द्वारा डांटकर बैठाने के बाद राजेंद्र बाबू चुप हो गए। सभा को समाप्त कर दिया गया। राजेंद्र बाबू जीरादेई चले आए। उधर पटेल जी ने देश भर के सभी बड़े नेताओं का हस्ताक्षर राजेंद्र बाबू को राष्ट्रपति बनाए जाने के पक्ष में कराया। 20 दिनों तक यह काम होता रहा। फिर राजेंद्र बाबू को खोजते-खोजते दिल्ली से अनुग्रह बाबू के साथ कुछ लोग जीरादेई आए और उनको मनाकर दिल्ली ले गए, जहां पर 26 जनवरी 1950 को उन्हें औपबंधिक राष्ट्रपति बनाया गया। महात्मा भाई बताते हैं कि उनकी माता जी भी देशरत्न के राष्ट्रपति बनने की कहानी बताती रही हैं। मां ने कहा था कि राजेंद्र बाबू को लेने के लिए दिल्ली से जो लोग आए थे, उनमें सरदार पटेल जरूर रहे होंगे। क्योंकि उस समय गांव में भी इसकी चर्चा खूब होती थी। लोग बताते थे कि जब तक सरदार पटेल लेने नहीं आएंगे, तब तक राजेंद्र बाबू दिल्ली नहीं जाएंगे। महात्मा भाई ने बताया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए पं. नेहरू ने झूठ तक का सहारा लिया था। नेहरू ने 10 सितंबर 1949 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर कहा कि उन्होंने (नेहरू) और सरदार पटेल ने फैसला किया है कि सी. राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनाना सबसे बेहतर होगा। नेहरू ने जिस तरह से यह पत्र लिखा था, उससे डॉ.राजेंद्र प्रसाद को घोर कष्ट हुआ और उन्होंने पत्र की एक प्रति सरदार पटेल को भिजवाई। वे उस वक्त मुंबई में थे। कहते हैं कि सरदार पटेल उस पत्र को पढ़ कर सन्न थे, क्योंकि उनकी इस बारे में नेहरू से कोई चर्चा ही नहीं हुई थी। इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 11 सितंबर 1949 को नेहरू को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पार्टी में उनकी जो स्थिति रही है, उसे देखते हुए वे बेहतर व्यवहार के पात्र हैं। नेहरू को जब यह पत्र मिला तो उन्हें लगा कि उनका झूठ पकड़ा गया। अपनी फजीहत कराने के बदले उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करने का निर्णय लिया।
जामापुर निवासी अति बुजुर्ग बांके बिहारी ¨सह ने राजेंद्र बाबू के राष्ट्रपति बनने के घटनाक्रम को अपनी डायरी में अंकित किया है। डायरी के पन्नों को पलटते हुए उन्होंने बताया कि सरदार पटेल ने पं. नेहरू को खुली चुनौती दी थी कि कार्यसमिति की बैठक में प्रस्ताव रखा जाए, जिसके पक्ष में ज्यादा समर्थक होंगे, उसे राष्ट्रपति बनाया जाएगा। नेहरू जानते थे कि कार्यसमिति के तीन चौथाई सदस्य डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में हैं तो उन्होंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी।

शनिवार, 17 जून 2017

संचार सिद्धांत और भारतीय दर्शन

संचार संबंधी भारतीय अवधारणा के बारे में जानना काफी रोचक और दिलचस्प होगा। आधुनिक संकल्पना में अन्तर्राष्ट्रीय संचार एवं संवाद की बात जोर-शोर से की जाती है, जो भारतीय चेतना और स्मृति में गहरे व्याप्त है। भारत में केवल अंतःवैयक्तिक संचार के कई ऐसे अनछुए पहलू हैं, जो मनुष्य की आंतरिक सक्रियता को सूक्ष्म और सूक्ष्मेतर ढंग से व्याख्यायित करती हैं। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘गंगा महज एक नदी नहीं, हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, वाराणसी और वृंदावन महज शहर नहीं हैं। मनुष्य का अतीत संग्रहालयों में बंद नहीं है, न ही उसके देवता यूनानी देवताओं की तरह पौराणिक काल के स्मृति-चिन्ह्र हैं। मिथक और यथार्थ, पौराणिक स्मृति और वर्तमान जीवन, देवता और मनुष्य आज भी एक साथ रहते हैं। सैकड़ों विश्वासों, आस्थाओं, समृतियों और संस्कारों का यह संगम और पारस्परिक संपर्क-संवाद केवल भारतीय संस्कृति में ही संभव हो सकता था-जिसमें संपूर्ण मनुष्य की परिकल्पना निहित रहती है।’’ यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि भारतीय मानस संचार की अंतः-प्रेरणा को सिर्फ अपने भीतर समेटे रखने का आदी नहीं है। यहां विचारों, अनुभवों और जानकारियों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी सतत् प्रवाह है। यह परकाया प्रवेश की स्थिति है। भारतीय परंपरा में संवाद-चर्चा या शास्त्रार्थ का प्रभाव हर जगह विद्यमान है। ऋग्वेद में संवाद-सूक्त के अन्तर्गत दशम मंडल में सरया-पणि(कुतिया और गौ) संवाद है, तो यम-यमी तथा पुरूरवा-उर्वशी संवाद का भी उल्लेख है। मण्डल तीन में विश्वामित्र और नदी संवाद एवं कठोपनिषद् में नचिकेता-यम के बीच अद्भुत संवाद प्रकरण है। बृहदारण्यक में याज्ञवल्क्य ऋषि का मैत्रेयी और गार्गी से संवाद स्मरणीय है। इसी तरह रामचरितमानस में शिव-पार्वती संवाद और काकभुसुण्डी-गरुण संवाद भारतीय संचार की पारंपरिकता का शाश्वत प्रमाण हैं। इन अन्तर्वैयक्तिक संवादों में पूरी सृष्टि का लोक-व्यवहार समाहित है। भारतीय संचार-पद्धति में अंतःवैयक्तिक संचार एवं अंतर्वैयक्तिक संचार के अतिरिक्त समूह संचार के भी साक्ष्य मौजूद हैं। रामचरित मानस में वर्णित याज्ञवल्क्य ऋषि का ऋषि-सभा में संवाद तथा सुत्तपिटक् में महात्मा बुद्ध का अपने शिष्यों से संवाद उदाहरण हैं। ये शिष्य मत-नेता(व्चपदपवद स्मंकमत) होते थे, जिनका दायित्व गुरु की बातों को लोक में प्रचारित-प्रसारित करना होता था। संचार की भारतीय अवधारणा को समझने के लिए आत्म-चेतना और आत्म-दृष्टि का सर्वप्रथम विकास किया जाना आवश्यक है अन्यथा आधुनिक तकनीक और प्रौद्योगिकी आधारित संचार-तंत्र ही सर्वगुण संपन्न एवं सर्वशक्तिमान मालूम होंगे, जिनका हाल के दिनों में बतौर आयातित संस्कृति भारत में दखल तेजी से बढ़ा है। हाल ही में ब्रिटेन में किए गए एक सर्वेक्षण से स्पष्ट है-‘‘अब व्यक्ति को किसी से सीधे संवाद या संपर्क रखने और आसपास के लोगों के सुख-दुख में शरीक होने के बजाय आभासी संबंधों(टमतजनंस त्मसंजपवद) में ज्यादा दिलचस्पी है। आवाजों, शब्दों, गतियों, और रंगों की हर पल गतिमान बदलती आभासी दुनिया में खोया रहने वाला व्यक्ति न सिर्फ अकेला होता है, बल्कि सार्थक सामाजिक संबंध बना पाने के लिए भी नाकाबिल हो जाता है। इस स्थिति में नेट सर्च करना, ई-मेल करना, चैटिंग, सोशल नेटवर्किंग और टीवी देखना वास्तविक जीवन के प्रत्यक्ष सुख से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं।’’ इस बात से इन्कार संभव नहीं है कि आज संबंधों में आत्मीयता के लिए जगह घटी है। सामाजिक वातावरण में मानवीयता के लिए स्थान सुरक्षित नहीं है। भारत प्रकारांतर से जीवन के जिस अनुभवजनित विचार-दृष्टि को सांस्कृतिक विरासत का संवाहक मानता आया है, वह आज नष्ट होने की कगार पर है। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘भारतीय संस्कृति का मनुष्य और सृष्टि से संबंध सार्वभौमिक संपूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है। भारतीय संस्कृति में आज भी समस्त विकृतियों मसलन ढोंग, पाखण्ड, कर्मकाण्ड, दकियानूसी आचरण, अंधविश्वास आदि के बावजूद वे तत्व मौजूद हैं, जिनके रहते मनुष्य को कभी इतनी स्पर्धा और अहम्केन्द्रित अभिमान नहीं हुआ कि प्रगति की लालसा में वह सृष्टिगत अनिवार्य संबंधों का ही संहार कर दे।’’ यह ब्रिटिश राजनीतिज्ञ लार्ड मैकाले की उस चिंता का निराकरण है, जिसमें उसने स्वीकार किया था-‘‘हम भारत में पश्चिमी संस्कृति का प्रभुत्व तब तक स्थापित नहीं कर पायेंगे, जबतक भारतीय शिक्षा पद्धति से संस्कृत भाषा को पूरी तरह निष्काषित नहीं कर देते।’’ यह सोच या विचारधारा मैकाले की व्यक्तिगत नहीं है। पूरे पश्चिम की अवधारणा संकीर्ण और पूर्वग्रह से ग्रसित है। असल में उनका समाज भारत की तरह सांस्कृतिक बहुलता और बहुभाषिकता से परिचित नहीं है और न ही उनमें एशियाई समाजों की भांति खुला सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो सका है। पश्चिम का संबंध दूसरी संस्कृतियों से हमेशा शक्ति आधारित रहा है। जिस कारण किसी और समाज की बौद्धिक संपदा की सराहना और उसे पचा सकने की प्रवृति उनमें नहीं है। खासकर भारत जैसे समाज की तो हरगिज ही नहीं, जो कभी पश्चिम का उपनिवेश रह चुका है। यूरोपीय विचारों के इतिहास में ज्ञानोदय का प्रादुर्भाव महत्वपूर्ण माना गया है। ज्ञानोदय का अर्थ विवेकवाद, तकनीकी केन्द्रीयता, ज्ञान और उत्पादन का मानकीकरण, रैखिक प्रगति, सार्वभौम और निरपेक्ष सत्य में विश्वास का प्रतिनिधित्व करने से है। इस चिंतन का असर तत्कालीन समाज पर इतना ज्यादा था कि पूरी दुनिया एक खास तरह की विचारधारा में समेटी जाने लगी। पश्चिम में पनपे विचार कसौटी बन गए, जिस पर दुनिया की सभी ज्ञान-परम्पराएं जांची-परखी जाने लगीं। यूरोप के ही एक चिंतक हाइडेगर ने इस प्रवृति को ‘धरती का यूरोपीकरण’ की संज्ञा दी है। प्रसंगवश, यदि हम पश्चिमी चिंतक जिजेक के हवाले से कहें, तो-‘‘इसमें कोई शक नहीं है कि हमारी सोच किसी न किसी स्थापित विचारधारा से निकलती है और हमारे जीवन का हर आयाम उससे प्रभावित होता है। जाने-अनजाने पूंजीवादी विचारधारा ने पिछले सौ वर्षों में समाज के हर आयाम को प्रभावित किया है। इसने न केवल सामान्य लोगों के दैनिक जीवन को अपने अनुसार ढाला है, बल्कि विरोध के हर स्वर को पूंजीवाद के समर्थन के स्वर में तब्दील कर दिया है।’’ 
आलोचनात्मक यथार्थवाद के प्रवर्तक रॉय भास्कर के अनुसार यथार्थ की एकांगी समझ के कारण चिंतन भी एकपक्षीय हो गया है। भौतिक सुखों के बहुतायत के बावजूद समाज घोर मानसिक संताप से गुजर रहा है। संचार के साधन बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य एकाकी होता जा रहा है। मनुष्य जीवन के सूक्ष्मतम अनुभवों से वंचित है। ऐसे में हिंसा, अपराध, आत्महत्या आम बात हो चली है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि इससे समाज तो हिंसक होगा ही, मानवता के लिए भी संकट उत्पन्न हो जाएगा।
यदि हम संचार के परिप्रेक्ष्य में विचारधारा की बात करें, तो पाएंगे कि विचारधारा एक संपूर्ण विश्व-दृष्टि को व्यक्त करने वाले सिद्धांत की तरह प्रयुक्त होता है, जबकि सिद्धांत को किसी विचारधारा की पूर्वपीठिका नहीं माना जा सकता है। वैसे यह विवाद का विषय है, लेकिन कई बार स्वयं संचार-माध्यमों की भी अपनी विचारधारा होती है। भारत के बारे में, ब्रिटेन के संचार-माध्यम की जैसी सोच है, वैसा ही रूस भी सोचे या अमेरिका भी इसी नजरिए से भारत को देखे, यह जरूरी नहीं। मार्क्स और एंगेल्स ने संचार-संबंधी जो अवधारणा प्रस्तुत की है, उनके अनुसार-‘‘संचार के लिए प्रस्तुत विचारों का संबंध सिर्फ चेतना से नहीं होता है। वह समाज की भौतिक स्थितियों से पैदा होते हैं। खुद चेतना का अस्तित्व भौतिक और स्थूल स्वरूपों से है। जो भी नया वर्ग अपने से पहले शासन करने वाले वर्ग के स्थान पर अपने को प्रतिष्ठित करता है, अपनी लक्ष्य सिद्धि की खातिर ही अपने हित को समाज के तमाम सदस्यों के समान हित के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बाधित होता है। यहां नए विचारों को इस रूप में प्रस्तुत करना होता है, जैसे यह किसी एक वर्ग के नहीं बल्कि पूरे समाज के विचार हैं।’’

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

किस्सा-ए-ईमानदारी

लेखक :-शिवेंदु राय 
प्रधानमंत्री मोदी अगर ईमानदार हैं तो उनसे कैसे निबटा जाए, यह आजकल की सबसे ज्वलंत समस्या है | तथाकथित राजनीति विज्ञान के विद्वान इस दिशा में पोथियाँ तैयार करने में लगे हैं | सभी राजनीतिक पार्टियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि मोदी की ईमानदारी अब विकराल रूप ले चुकी है |  इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि सभी पार्टियाँ इस सामयिक समस्या पर मिल बैठ कर विचार करे | ईमानदारी के विरुद्ध मैं भी चिंतन करने को तैयार हूँ | ये जानते हुये भी कि चिन्तन का विषय मैंने नहीं निर्धारित किया है, मेरे अपने फायदे या नुकसान से जुड़ा मसला नहीं है |
पहली कड़ी में आदत के विरुद्ध कजरौटे से दुश्मनी कैसे संभव है भाई | आज तक काजल की कोठरी में बैठने की आदत थी, अब काजल से परहेज हजम कैसे होगा | अगर मैं कहूँ कि प्रधानमंत्री अगर ईमानदारी के संत-ब्रांड है तो उनके विरोधी, चेलों की कला के बारे में लिखा गया चालीसा शुरू कर देंगे | और उनके चेले उस ईमानदारी को लछेदार शब्दों में बेवजह प्रतिभा का परिचय देते हुए नृत्य करने लगेंगे | जिसकी कोई जरुरत नहीं थी | अब ईमानदारी गई तेल लेने चर्चा शुरू होगी नृत्य पर |
दूसरी कड़ी नृत्य की है, जिसमें सभी पार्टीयों के नेता नृत्य का विश्लेषण करने के साथ, नृत्य की नयी कला का विकास करने का दावा ठोक देंगे | इस नृत्य के विकास से जनता को क्या मिला, ये लगातार पार्टी के प्रवक्ता लोग स्थापित करने में लग जाते हैं, जनता को विकसित नृत्य कब्ज की तरह दे कर ही मानते हैं |
तीसरी कड़ी में सत्ता पक्ष भारतीय सनातन संस्कृति की दुहायी दे कर नृत्य विकास के कई बिन्दुओं पर आपत्ति दर्ज करते हैं | आपत्ति तो बनती है , देश की जनता को चूतिया बनाने का सबसे आसान तरीका है भारतीय संस्कृति की दुहायी देना | व्यक्तिगत आजादी के नाम पर जैसे कम्युनिस्टों द्वारा जिम्मेदारिओं से बचा जाता रहा है | ठीक वैसे ही संस्कृतिनिष्ठ पार्टीयां भारतीय सभ्यता को लेकर घडियाली आंसू बहाती रहती है | यह मौसमी फसल है कभी-कभी ये लोग बे-मौसम भी फसल लगा लेते हैं |
चौथी कड़ी में अगर फसल अच्छी हुयी तो ईमानदार मोदी को ‘पूजीपतियों का दलाल’ वाला पुराना ठप्पा कम्युनिस्टों द्वारा लगा दिया जायेगा | कुछ चिरकुट पार्टियाँ ‘विदेशी हाथ’ वाला फ़ॉर्मूला फिट करने में लगी रहती है | सत्ता के ख़िलाफ़ आंदोलन हो तो सरकार या सत्ता द्वारा दिया जाने वाला ‘विदेशी फंडिंग’ वाला फ़ॉर्मूला सबसे ज्यादा हिट रहता है | और किसी पश्चिम देश ने गलती से भी तारीफ कर दी तो कम्युनिस्टों का ‘पूजीपतियों की दलाल है ये सरकार’ ये फ़ॉर्मूला सदाबहार होता है | ये सब फोर्मेट आज़ादी समय से ही चले आ रहे हैं |

पांचवी और अंतिम कड़ी में फोर्मेट और फ़ॉर्मूले की व्याख्या की जायेगी | जिसमें आरक्षण, संघ, कॉमुनिस्ट जीवन- शैली, गाँधी, अम्बेडकर, नेहरू, जातिवाद आदि पर चर्चा होगी | सबसे पहले आरक्षण की समीक्षा की जाएगी क्यूँ कि संघ चाहता है | वैसे समीक्षा के तरीके साहित्य वाले नहीं होंगे | इस विषय पर सभी पार्टिओं की ईमानदारी बिना रीढ़ वाली होगी | क्यूँ कि सत्ता सुख किसे नहीं भाता भाई | एक ईमानदारी जो रीढ़ के साथ खड़ी है उसके सामने संघ और अम्बेडकर को खड़ा किया जायेगा | सवाल कुछ इस तरह के होंगे, संघ में अभी तक कोई दलित सरसंघचालक क्यूँ नहीं बना | संध दलित विरोधी है | अम्बेडकर को संघ कैसे हथिया सकता है | आज कल हथियाने की होड़ लगी है इसमें कौन कितनी तेज़ी से हथिया रहा है | ये समय समय पर समझने और देखने का विषय है, खैर | संघ के विषय में कॉमुनिस्ट भी कूद पड़ते हैं लेकिन बेचारे पकड़े जाते हैं क्यूँ कि पोलितब्यूरों में भी तो अभी तक कोई दलित शामिल नहीं हुआ है | कॉमुनिस्ट लोग इस बात पर अड़े है ईमानदारी हम चलने नहीं देंगे | बेईमान भी नहीं होने देंगे | कदम कदम पर टंगड़ी मरेंगे | चाहे हमारी टंगड़ी ही क्यूँ न टूट जाये | बयान देंगे हम ईमानदार के विरुद्ध | रैलियां करेंगे | भाई किसी के साथ तो रहना होगा ईमानदारी या बेईमानी | खैर, गाँधी जी, अम्बेडकर जी आप लोग नाराज़ नहीं होना, तफरी में आप लोगों पर भी चिन्ता करने वाली बात बोल गया | 

किस्सा-ए-अवैध रिश्ता

कॉमरेड, डेढ़ साल से देश की तरह मेरे गाँव में भी बड़ी चकचक मची हुई है, शोर हुआ है और लोग यहां-वहां गाँव के लिए तथाकथित सार्थक बहस करते पाए गए हैं | जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं मेरे गाँव के सभी गेटकीपर वैज्ञानिक विधि से बातचीत करने लगे हैं | परन्तु इस घटना का एक अच्छा असर यह हुआ है कि देश की तरह मेरे गाँव के लोगों को भी काम मिल गया है | जो फालतू बैठे थे, वे शोर करने लगे है ,संपादक के नाम पत्र भी लिखने लगे है | नहर की पुलिया पर बैठ के मूडीज जैसी संस्थाओं की समीक्षा करने लगे हैं | आज तक जिनका अवैध संबंध भी नहीं था राजनीति से वो तकनिकी पहलुओं पर बतियाने लगे हैं | भाई अपने देश में परम्परा रही है बतियाने की, ज्वलंत प्रश्न है मोदी सरकार, शहर के लोग ही समीक्षा कर सकते है क्या? गाँव का भी तो हक़ बनता है ?
 राजेन्द्र जी का लड़का जहाज में सफ़र कर रहा है चाचा ! अरे भाई क्यूँ न करे पीएचडी कर रहा है सरकारी वजीफा जो मिल रहा है | मेरा भी तो लड़का कर रहा है उसको तो नहीं मिलता जहाज लायक वजीफा | साला, जब देखो मेरे से ही मांगता रहता है पापा ये, पापा वो | भाई तुम पीएचडी करा रहे हो अपने लौंडे को कोई साधारण बात नहीं है शोध कार्य , शोध कार्य आसान नहीं होता है बहुत घूमना पड़ता है ,ट्रेन से लेकर जहाज तक ,रेलवे प्लेटफार्म पर सोना भी पड़ता है ,फ़िल्में भी देखनी होती है | ऑब्जरवेशन के लिए पता नहीं और क्या-क्या करना होता है | अगर तुमको और ज्यादा जानना है तो लखनऊ वाले विकसवा से पूछ लेना | यार देश में क्या-क्या हो रहा है और तुम पीएचडी-फियेचडी के चक्कर में टाइम ख़राब कर रहे हो |
एक बात सुने हो कि नहीं ? नितिशवा ने शराब बंद कर दिया | सुने है भाई, बिपत की घड़ी है हम लोगों के लिए | मनोहर भाई हम लोगों को कौन रोक सकता है पीने से ,किस सरकार में दम है क्या ? आप चिंता क्यूँ करते हैं ,जमुआँव गाँव को पाटकर रख देंगे नूरी, लैला से | ठीक है भाई तुमसे इस गाँव को बहुते उम्मीद है |
लाल बाबु भाई कहाँ फंस गए हम लोग शराब के चक्कर में देश में और भी तो मुददे हैं | साला देश का प्रधानमंत्री हमेसा विदेशे में रहता है जब देखो , देश का विकास कैसे होगा ? इस दिशा में हम लोगों को सोचने की जरुरत है |आप लोग नाराज़ नहीं होंगे तो मैं भी एक बात बोलू ? बोलो भाई क्यूँ कोई नाराज होगा | क्यूँ ना हम वर्कशॉप लगा कर देश की चिंता करे | बबन तिवारी नाच पार्टी के सभी कलाकार बेकार बैठे हैं ,उनको भी बुला लेते हैं ,’सांस्कृतिक संध्या के साथ देश के लिए चिन्तन’ विषय रखते हैं | कैसा लगा आप लोगों को ये आईडिया ? बहुत बढ़िया गुलाब तुम तो छा जाने वाली बात बोले हो | पंडित जी आप नूरी लैला का जुगाड़ कर दीजियेगा | ठीक है ,कर दूंगा !
लाल बाबु आप ईमानदार किसको मानते हैं नितीश या मोदी को ? भाई मैं तो नितीश को ही मानता हूँ क्यूँ कि वो काला धन छुपाने विदेश तो नहीं जाता है | मोदी इतना विदेश क्यूँ जा रहे हैं इसके पीछे यही कारण है काला धन छुपाना |  रहने दीजिये आप मोदी विरोधी  है कुछ भी बकवास करते रहते हैं | मोदी विरोधी हूँ मैं तो आप राम मंदिर क्यूँ नहीं बनवा देते हैं | बनेगा मंदिर इंतजार कीजिये | आपके दादा स्वर्गीय हो गए मंदिर के इंतजार में अब आप बचे है | दादा का नाम न लीजिये बेकार हो जायेंगे आप, निपटा दूंगा आपको | देखियें आप कितना असहिष्णुता फैला रहे हैं | मोदी का विरोध किया तो हिंसा पर उतर आए | भाई आपको तो संसद में खड्गे जी ने देश का माना ही नहीं है,हम लोग सही मायने में देश के वासी है | खड्गे जी ने कल ही प्रमाण पत्र दिया है | लाल बाबु जी तो क्या हम अभी तक हवा में रह रहे हैं ? लगता है कल आपने राजनाथ जी को नहीं सुना, सही बात आप लोग सुनते कहाँ है | बस आलोचना करवा लो आपसे |
शर्मा जी आप देख लीजियेगा ,उत्तर परदेश में चुनाव में  मोदी को अपनी औकात पता चल जायेगा,राम मंदिर अगर नहीं बना तो 20 सीट भी मिलना मुश्किल हो जायेगा,दाल सब गुजरात भेज दिए है | दाल महंगा हुआ है इसके पीछे मोदी का हाथ है | आज मेरी गाय नहीं खा रही है जानते है क्यूँ ? साला चोकर गुजरात का बना हुआ है | उसमें खून मिला है, जानवर तो सब समझ जाते हैं |
आप दोनों लोग मेन मुद्दे से भटका रहे हैं देश को | आज भारत मैंच जीता है ,कोहली बहुत बढ़िया कप्तान बन गया हैं | अभी तक मैच हार रहे थे इसके पीछे कारण धोनी था, क्यूँ संतोष जी क्या कहते हैं आप ? मैं क्या कहूँ सचिन होता तो जीत का मजा ही अलग होता | वो भगवान है | आप लोगों को पता है अभी तक मैंच हार रहे थे मोदी के कारण, खेलने ही नहीं देते है खिलाडिओं को , सबको मेंटली डिस्टर्ब कर दिया है मोदी ने |

भाई अब भैंस दुहने का समय हो गया है मैं जा रहा हूँ | चाचा मैं भी चलता हूँ ,अब कल चर्चा नियत समय पर करेंगे |
v लेखक-शिवेंदु राय , मूलत: जमुआँव, जिला – सिवान (बिहार) के रहनेवाले। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से मीडिया विषय में परास्नातक की शिक्षा प्राप्‍त की | वर्तमान में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यलय में पीएचडी शोधार्थी (संचार एवं मीडिया) है | इसके साथ ही देश के तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादकीय पृष्ठों के लिए समसामयिक एवं वैचारिक लेखन | राष्ट्रवादी रुझान की स्वतंत्र पत्रकारिता में सक्रिय एवं विभिन्न विषयों पर नया मीडिया पर नियमित लेखन। इनसे shivendu_rai@yahoo.com एवं 08964028587 पर संपर्क किया जा सकता है |