कमलेश्वर (6 जनवरी 1932-27 जनवरी 2007) हिन्दी लेखक कमलेश्वर बीसवीं शती के सबसे सशक्त लेखकों में से एक समझे जाते हैं। कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ लेखन, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। कमलेश्वर का लेखन केवल गंभीर साहित्य से ही जुड़ा नहीं रहा बल्कि उनके लेखन के कई तरह के रंग देखने को मिलते हैं। उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' हो या फिर भारतीय राजनीति का एक चेहरा दिखाती फ़िल्म 'आंधी' हो, कमलेश्वर का काम एक मानक के तौर पर देखा जाता रहा है। उन्होंने मुंबई में जो टीवी पत्रकारिता की, वो बेहद मायने रखती है। ‘कामगार विश्व’ नाम के कार्यक्रम में उन्होंने ग़रीबों, मज़दूरों की पीड़ा-उनकी दुनिया को अपनी आवाज दी।
कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी ज़िले में हुआ। उन्होंने 1954 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। उन्होंने फिल्मों के लिए पटकथाएँ तो लिखी ही, उनके उपन्यासों पर फिल्में भी बनी। `आंधी', 'मौसम (फिल्म)', 'सारा आकाश', 'रजनीगंधा', 'छोटी सी बात', 'मिस्टर नटवरलाल', 'सौतन', 'लैला', 'रामबलराम' की पटकथाएँ उनकी कलम से ही लिखी गईं थीं। लोकप्रिय टीवी सीरियल 'चन्द्रकांता' के अलावा 'दर्पण' और 'एक कहानी' जैसे धारावाहिकों की पटकथा लिखने वाले भी कमलेश्वर ही थे। उन्होंने कई वृतचित्रों और कार्याक्रमों का निर्देशन भी किया।
1995 में कमलेश्वर को `पद्मभूषण' से नवाजा गया और 2003 में उन्हें 'कितने पाकिस्तान'(उपन्यास) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वे `सारिका' `धर्मयुग', `जागरण' और `दैनिक भास्कर' जैसे प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं के संपादक भी रहे। उन्होंने दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसा महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाया। कमलेश्वर ने अपने 75 साल के जीवन में 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह, और क़रीब 100 फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखीं।
27 जनवरी 2007 को उनका निधन हो गया।
कृतियाँ
उपन्यास -
एक सड़क सत्तावन गलियाँ / कमलेश्वर
तीसरा आदमी / कमलेश्वर
डाक बंगला / कमलेश्वर
समुद्र में खोया हुआ आदमी / कमलेश्वर
काली आँधी / कमलेश्वर
आगामी अतीत / कमलेश्वर
सुबह...दोपहर...शाम / कमलेश्वर
रेगिस्तान / कमलेश्वर
लौटे हुए मुसाफ़िर / कमलेश्वर
वही बात / कमलेश्वर
एक और चंद्रकांता / कमलेश्वर
कितने पाकिस्तान / कमलेश्वर
पटकथा एवं संवाद
कमलेश्वर ने 99 फ़िल्मों के संवाद, कहानी या पटकथा लेखन का काम किया। कुछ प्रसिद्ध फ़िल्मों के नाम हैं-
1. सौतन की बेटी(1989)-संवाद
2. लैला(1984)- संवाद, पटकथा
3. यह देश (1984) -संवाद
4. रंग बिरंगी(1983) -कहानी
5. सौतन(1983)- संवाद
6. साजन की सहेली(1981)- संवाद, पटकथा
7. राम बलराम (1980)- संवाद, पटकथा
8. मौसम(1975)- कहानी
9. आंधी (1975)- उपन्यास
संपादन
अपने जीवनकाल में अलग-अलग समय पर उन्होंने सात पत्रिकाओँ का संपादन किया -
विहान-पत्रिका (1954)
नई कहानियाँ-पत्रिका (1958-66)
सारिका-पत्रिका (1967-78)
कथायात्रा-पत्रिका (1978-79)
गंगा-पत्रिका(1984-88)
इंगित-पत्रिका (1961-68)
श्रीवर्षा-पत्रिका (1979-80)
अखबारों में भूमिका
वे हिन्दी दैनिक `दैनिक जागरण' में 1990 से 1992 तक तथा `दैनिक भास्कर' में १९९७ से लगातार स्तंभलेखन का काम करते रहे।'
कहानियाँ
कमलेश्वर ने तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनकी कुछ प्रसिद्ध कहानियाँ हैं -
राजा निरबंसिया / कमलेश्वर
सांस का दरिया / कमलेश्वर
नीली झील / कमलेश्वर
तलाश / कमलेश्वर
बयान / कमलेश्वर
नागमणि / कमलेश्वर
अपना एकांत / कमलेश्वर
आसक्ति / कमलेश्वर
जिंदामुर्दे / कमलेश्वर
जॉर्ज पंचम की नाक / कमलेश्वर
मुर्दों की दुनिया / कमलेश्वर
कस्बे का आदमी / कमलेश्वर
स्मारक / कमलेश्वर
नाटक
उन्होंने तीन नाटक लिखे -
अधूरी आवाज / कमलेश्वर
रेत पर लिखे नाम / कमलेश्वर
हिंदोस्ता हमारा / कमलेश्वर
बाजारवाद की अंधी दौड़ ने समाज-जीवन के हर क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, खासकर, पत्रकारिता सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पत्रकारिता ने जन-जागरण में अहम भूमिका निभाई थी लेकिन आज यह जनसरोकारों की बजाय पूंजी व सत्ता का उपक्रम बनकर रह गई है। मीडिया दिन-प्रतिदिन जनता से दूर हो रही है। यह चिंता का विषय है। आज पूंजीवादी मीडिया के बरक्स वैकल्पिक मीडिया की जरूरत रेखांकित हो रही है, जो दबावों और प्रभावों से मुक्त हो। विचार पंचायत इसी दिशा में एक सक्रिय पहल है।
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
भारतीय फिल्म पटकथा
हर फिल्म की एक पटकथा होती है, इसे ही स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले भी कहते हैं। पटकथा में दृश्य, संवाद, परिवेश और शूटिंग के निर्देश होते हैं। शूटिंग आरंभ करने से पहले निर्देशक अपनी स्क्रिप्ट पूरी करता है। अगर वह स्वयं लेखक नहीं हो, तो किसी दूसरे लेखक की मदद से यह काम संपन्न करता है। भारतीय परिवेश में कहानी, पटकथा और संवाद से स्क्रिप्ट पूरी होती है। केवल भारतीय फिल्मों में ही संवाद लेखक की अलग कैटगरी होती है। यहां कहानी के मूलाधार पर पटकथा लिखी जाती है। कहानी को दृश्यों में बांटकर ऐसा क्रम दिया जाता है कि कहानी आगे बढ़ती दिखे और कोई व्यक्तिक्रम न पैदा हो। शूटिंग के लिए आवश्यक नहीं है कि उसी क्रम को बरकरार रखा जाए, लेकिन एडीटिंग टेबल पर स्क्रिप्ट के मुताबिक ही फिर से क्रम दिया जाता है। उसके बाद उसमें ध्वनि, संगीत आदि जोड़कर दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाया जाता है। पटकथा लेखन एक तरह से सृजनात्मक लेखन है, जो किसी भी फिल्म के लिए अति आवश्यक है। इस लेखन को साहित्य में शामिल नहीं किया जाता। ऐसी धारणा है कि पटकथा साहित्य नहीं है। हिंदी फिल्मों के सौ सालों के इतिहास में कुछ ही फिल्मों की पटकथा पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो सकी है। गुलजार, राजेन्द्र सिंह बेदी और कमलेश्वर की फिल्मों की पटकथाएं एक समय न केवल प्रकाशित हुई, बल्कि बिकीं भी, लेकिन फिर भी उन्हें साहित्य का दर्जा हासिल नहीं हुआ! साहित्य के पंडितों के मुताबिक पटकथा शुद्ध शुद्ध रूप से व्यावसायिक लेखन है और किसी फिल्म के लिए ही उसे लेखक लिखते हैं, इसलिए उसमें साहित्य की मौलिकता, पवित्रता और सृजनात्मकता नहीं रहती। साहित्य की सभी विधाओं की तरह पटकथा लेखक की स्वाभाविक और नैसर्गिक अभिव्यक्ति नहीं है, इसलिए उसे साहित्य नहीं माना जा सकता। फिल्मों के लेखक और साहित्यकारों के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई है। दरअसल, फिल्मों के लेखक यह मानते हैं कि उनका लेखन किसी प्रकार से साहित्यिक लेखन से कम नहीं है। उसमें भी मौलिकता होती है और वह फिल्म के रूप में अपने दर्शकों को साहित्य के समान दृश्यात्मक आनंद देती है।
मशहूर फिल्म लेखक और शायर जावेद अख्तर कहते हैं कि पटकथा के प्रति प्रकाशकों और साहित्यकारों को अपना दुराग्रह छोड़ना चाहिए! उनकी राय में हिंदी में ऐसी कई फिल्में बनी हैं, जिनकी पटकथा में साहित्यिक संवेदनाएं हैं और इसीलिए उन्हें पुस्तक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। वे अपने तर्क का विस्तार नाटकों तक करते हैं। वे कहते हैं कि नाटकों का मंचन होता है। उसमें भी अभिनेता, संगीत और अन्य कला माध्यमों का उपयोग होता है। वह भी दर्शकों के मनोरंजन के लिए ही रचा जाता है। वे पूछते हैं कि अगर नाटक साहित्यिक विधा है, तो फिर पटकथा से परहेज क्यों है? जावेद अख्तर चाहते हैं कि श्रेष्ठ हिंदी फिल्मों की पटकथा प्रकाशित होनी चाहिए। मराठी के नाटककार और होली और पार्टी जैसी फिल्मों के लेखक महेश एलकुंचवार स्पष्ट कहते हैं कि पटकथा को साहित्यिक दर्जा नहीं दिया जा सकता। पटकथा स्वयं पूर्ण रचना नहीं होती। प्रकाश और ध्वनि के साथ मिलकर वह फिल्म का रूप लेती है। अगर पटकथा प्रकाशित की जाएगी, तो उसमें सहायक साधनों को नहीं रखा जा सकेगा। प्रकाश और ध्वनि के अभाव में पटकथा का वही प्रभाव नहीं रहेगा, जो फिल्म देखते समय रहा होगा। साहित्य के पंडित और आलोचकों के पास और भी तर्क हैं। पटकथा के प्रभाव को भारतीय दर्शक अच्छी तरह समझते हैं। फिल्म प्रभावशाली माध्यम है और इसका असर व्यापक होता है। कई बार फिल्मों के रूप में आने के बाद साहित्यिक विधाएं ज्यादा लोकप्रिय हुई हैं। ताजा उदाहरण फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर है। इसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए प्रकाशक ने उपन्यास का मूल नाम क्यू एंड ए बदल दिया है। साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे, जिन्हें फिल्मों की वजह से ज्यादा पाठक मिले। इस लिहाज से अगर पटकथा को स्वतंत्र कृति के रूप में प्रकाशित किया जाए, तो निश्चित ही पाठक फिल्म का साहित्यिक आनंद उठा सकेंगे। मुमकिन है, कुछ दशक बाद उन्हें साहित्य का दर्जा भी हासिल हो जाए!
मशहूर फिल्म लेखक और शायर जावेद अख्तर कहते हैं कि पटकथा के प्रति प्रकाशकों और साहित्यकारों को अपना दुराग्रह छोड़ना चाहिए! उनकी राय में हिंदी में ऐसी कई फिल्में बनी हैं, जिनकी पटकथा में साहित्यिक संवेदनाएं हैं और इसीलिए उन्हें पुस्तक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। वे अपने तर्क का विस्तार नाटकों तक करते हैं। वे कहते हैं कि नाटकों का मंचन होता है। उसमें भी अभिनेता, संगीत और अन्य कला माध्यमों का उपयोग होता है। वह भी दर्शकों के मनोरंजन के लिए ही रचा जाता है। वे पूछते हैं कि अगर नाटक साहित्यिक विधा है, तो फिर पटकथा से परहेज क्यों है? जावेद अख्तर चाहते हैं कि श्रेष्ठ हिंदी फिल्मों की पटकथा प्रकाशित होनी चाहिए। मराठी के नाटककार और होली और पार्टी जैसी फिल्मों के लेखक महेश एलकुंचवार स्पष्ट कहते हैं कि पटकथा को साहित्यिक दर्जा नहीं दिया जा सकता। पटकथा स्वयं पूर्ण रचना नहीं होती। प्रकाश और ध्वनि के साथ मिलकर वह फिल्म का रूप लेती है। अगर पटकथा प्रकाशित की जाएगी, तो उसमें सहायक साधनों को नहीं रखा जा सकेगा। प्रकाश और ध्वनि के अभाव में पटकथा का वही प्रभाव नहीं रहेगा, जो फिल्म देखते समय रहा होगा। साहित्य के पंडित और आलोचकों के पास और भी तर्क हैं। पटकथा के प्रभाव को भारतीय दर्शक अच्छी तरह समझते हैं। फिल्म प्रभावशाली माध्यम है और इसका असर व्यापक होता है। कई बार फिल्मों के रूप में आने के बाद साहित्यिक विधाएं ज्यादा लोकप्रिय हुई हैं। ताजा उदाहरण फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर है। इसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए प्रकाशक ने उपन्यास का मूल नाम क्यू एंड ए बदल दिया है। साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे, जिन्हें फिल्मों की वजह से ज्यादा पाठक मिले। इस लिहाज से अगर पटकथा को स्वतंत्र कृति के रूप में प्रकाशित किया जाए, तो निश्चित ही पाठक फिल्म का साहित्यिक आनंद उठा सकेंगे। मुमकिन है, कुछ दशक बाद उन्हें साहित्य का दर्जा भी हासिल हो जाए!
बुधवार, 20 अक्टूबर 2010
हिंदू राजनीति का अभाव!!!!!!!!!!!!1
पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर देगागा में इस वर्ष दुर्गा पूजा नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की। इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते। वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।
क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित संगठन भी नहीं है।
कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपनी टेक घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता की अभिव्यक्ति से बचती है। मुस्लिम संगठन ठीक उलटा करते हैं। इसलिए भाजपा पर हिंदू साप्रदायिक होने या हिंदुत्व से भटकने के दोनों आरोप गलत हैं, जो उसके विरोधी या समर्थक लगाते हैं। विरोधी इसलिए, क्योंकि किसी न किसी को हिंदू-साप्रदायिक कहना उनकी जरूरत है ताकि वे मुस्लिम वोट-बैंक के सामने अपना हाथ फैलाएं। समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं। भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है। अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी। इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।
अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मक है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जिसमें हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न हो, जो प्रबल विरोधियों के समक्ष सच कहने से कतराता हो, जिसके कार्यकर्ता पहले अपना निजी स्वार्थ साधने के लोभ में डूबे रहते है। वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा। उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात।
क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित संगठन भी नहीं है।
कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपनी टेक घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता की अभिव्यक्ति से बचती है। मुस्लिम संगठन ठीक उलटा करते हैं। इसलिए भाजपा पर हिंदू साप्रदायिक होने या हिंदुत्व से भटकने के दोनों आरोप गलत हैं, जो उसके विरोधी या समर्थक लगाते हैं। विरोधी इसलिए, क्योंकि किसी न किसी को हिंदू-साप्रदायिक कहना उनकी जरूरत है ताकि वे मुस्लिम वोट-बैंक के सामने अपना हाथ फैलाएं। समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं। भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है। अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी। इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।
अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मक है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जिसमें हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न हो, जो प्रबल विरोधियों के समक्ष सच कहने से कतराता हो, जिसके कार्यकर्ता पहले अपना निजी स्वार्थ साधने के लोभ में डूबे रहते है। वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा। उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात।
हिंदू राजनीति का अभाव!!!!!!!!!!!!1
पश्चिम बंगाल के छोटे से शहर देगागा में इस वर्ष दुर्गा पूजा नहीं मनाई गई, क्योंकि तृणमूल काग्रेस से जुड़े एक दबंग मुस्लिम नेता ने हिंदू आबादी पर सुनियोजित हिंसा की। इस पर सत्ताधारी लोग और मीडिया, दोनों लगभग मौन रहे। स्थानीय हिंदुओं को भय है कि उन पर हमले करके आतंकित कर उन्हें वहां से खदेड़ भगाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। असम और बंगाल में कई स्थानों पर यह पहले ही हो चुका है, इसलिए इस जनसाख्यिकी आक्रमण को पहचानने में वे भूल नहीं कर सकते। वस्तुत: ऐसी घटनाओं पर राजनीतिक मौन ही इसके वास्तविक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है।
क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित संगठन भी नहीं है।
कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपनी टेक घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता की अभिव्यक्ति से बचती है। मुस्लिम संगठन ठीक उलटा करते हैं। इसलिए भाजपा पर हिंदू साप्रदायिक होने या हिंदुत्व से भटकने के दोनों आरोप गलत हैं, जो उसके विरोधी या समर्थक लगाते हैं। विरोधी इसलिए, क्योंकि किसी न किसी को हिंदू-साप्रदायिक कहना उनकी जरूरत है ताकि वे मुस्लिम वोट-बैंक के सामने अपना हाथ फैलाएं। समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं। भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है। अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी। इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।
अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मक है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जिसमें हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न हो, जो प्रबल विरोधियों के समक्ष सच कहने से कतराता हो, जिसके कार्यकर्ता पहले अपना निजी स्वार्थ साधने के लोभ में डूबे रहते है। वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा। उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात।
क्या किसी शहर में मुस्लिमों द्वारा किसी बात पर विरोध-स्वरूप ईद न मनाना भारतीय मीडिया के लिए उपेक्षणीय घटना हो सकती थी। चुनी हुई चुप्पी और चुना हुआ शोर-शराबा अब तुरंत बता देता है कि किसी साप्रदायिक हिंसा का चरित्र क्या है। पीड़ित कौन है, उत्पीड़क कौन। जब भी हिंदू जनता हिंसा और अतिक्रमण का शिकार होती है, राजनीतिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया मानो किसी दुरभिसंधि के अंतर्गत मौन हो जाता है। यह आसानी से इसलिए संभव होता है, क्योंकि भारत में कोई संगठित हिंदू राजनीतिक समूह नहीं है। हिंदू भावनाएं, दुख या चाह को व्यक्त करने वाला कोई घोषित या अघोषित संगठन भी नहीं है।
कुछ लोग भाजपा को हिंदू राजनीति से जोड़ते हैं, किंतु इस पर हिंदुत्व थोपा हुआ है। स्वयं भाजपा ने कभी हिंदू चिंता को अपनी टेक घोषित नहीं किया। इसने पिछला लोकसभा चुनाव भी विकास और मजबूती के नारे पर ही लड़ा था। गुजरात, मध्य प्रदेश या बिहार में भी वह हिंदू चिंता की अभिव्यक्ति से बचती है। मुस्लिम संगठन ठीक उलटा करते हैं। इसलिए भाजपा पर हिंदू साप्रदायिक होने या हिंदुत्व से भटकने के दोनों आरोप गलत हैं, जो उसके विरोधी या समर्थक लगाते हैं। विरोधी इसलिए, क्योंकि किसी न किसी को हिंदू-साप्रदायिक कहना उनकी जरूरत है ताकि वे मुस्लिम वोट-बैंक के सामने अपना हाथ फैलाएं। समर्थक भाजपा पर भटकने का आरोप इसलिए लगाते हैं, क्योंकि हिंदू चिंता को उठाने वाला कोई दल न होने के कारण वे भाजपा पर ही अपनी आशाएं लगा बैठते हैं। भाजपा इन आशाओं का विरोध नहीं करती, पर उसने कभी इन आशाओं को पूरा करने का वचन भी नहीं दिया। राम मंदिर बनाने की बात या धारा 370 हटाने की आवश्यकता बताना-हिंदू राजनीति नहीं है। अयोध्या में ताला खुलवाकर पूजा की शुरुआत तो राजीव गांधी ने ही की थी। इसी प्रकार धारा 370 के अस्थायी होने की बात तो संविधान में काग्रेस ने ही लिखी थी।
अत: इक्का-दुक्का भाजपा नेताओं द्वारा कभी-कधार कुछ कहना हिंदू राजनीति नहीं है। यह कभी-कभार हिंदू भावनाओं को उभारती या उपयोग करती है, पर यह नीति भारत में प्रचलित हिंदू-विरोधी सेक्युलरवाद से पार नहीं पा सकती। उसी तरह वह हिंदुत्व भी अकर्मक है जिसमें खुल कर सामने आने का साहस नहीं, जिसमें हर हाल में सही बात कहने की दृढ़ता न हो, जो प्रबल विरोधियों के समक्ष सच कहने से कतराता हो, जिसके कार्यकर्ता पहले अपना निजी स्वार्थ साधने के लोभ में डूबे रहते है। वह भी व्यर्थ हिंदुत्व ही है जो केवल सत्ता पाने अथवा पहले सत्ता में आने के लिए हिंदू भावनाओं का उपयोग करने का प्रयास करता हो। यह सब छद्म हिंदुत्व है जो यहां प्रचलित सेक्युलरवाद से हारता रहा है, हारता रहेगा। उपर्युक्त भाव और रूप किसी दल या नेता की विशेषताएं नहीं हैं। यह विभिन्न संगठनों और विभिन्न नेताओं-कार्यकर्ताओं की विशेषताएं हैं। यह अपने स्वभाव से ही इतना दुर्बल है कि शिकायतें करने और दूसरों पर निर्भर रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता, इसीलिए छद्म हिंदुत्व, शिकायती हिंदुत्व और हिंदू राजनीति के अभाव में वस्तुत: कोई भेद नहीं है। अत: इस गंभीर सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि जिस तरह मुस्लिम राजनीति एक स्थापित शक्ति है, उसी तरह किसी हिंदू राजनीति का अस्तित्व ही नहीं है। हिंदू भावनाओं वाले कुछ नेता-कार्यकर्ता अनेक दलों में हैं, पर हिंदू भावना एक बात है और हिंदू राजनीति को स्वर देना बिलकुल दूसरी बात।
बुधवार, 29 सितंबर 2010
मुस्लिम -हिन्दू और भारत !!!!!!!!!!!
आज हमारे चारों ओर का माहौल कुछ ऐसा सुलगता हुआ सा प्रतीत होता है, जैसे हम फ़ूटे ज्वालामुखी के पिघले लावे के बीच से रास्ता बनाते हुए कहीं जा पा रहे हों । वृहत्तर भारत के कई खंड में विभाजित हो जाने और अलग-अलग टुकड़ों पर अपनी रोटियां अलग पकाकर खाने के बावज़ूद हमारे कलेज़े की आग कहीं से भी ठंडी होती प्रतीत नहीं होती । विश्व राजनीति, अर्थनीति और भौतिकवाद ने मानव समाज की सोच को इतने संकुचित दायरे में क़ैद कर दिया है, कि मनुष्य का अपना प्राकृतिक स्वभाव होता क्या है, इसको जानने के लिये भी वन्य पशुओं के स्वभाव का अध्ययन करना पड़ रहा है । बढ़ती जनसंख्या भी इसका कारण रही जिसने क्रमश: घर, समाज, प्रान्त और देशों तक में दीवारें खड़ी करने का एक कभी खत्म न होने वाला सिलसिला बना दिया । फ़िर भी हमारा भारत ही इससे अधिक आक्रांत रहा है, क्योंकि इतनी विशालता के बावज़ूद इसका एकीकृत ढांचा विदेशी ताक़तों के लिये परेशानी और ईर्ष्या का सबब रहा । पिछले चार-पांच सौ वर्षों में लगातार विदेशी आक्रमण झेलते इस भूभाग पर परिस्थितियों ने एक धर्म से कई धर्म, पंथ और मज़हबों में इसको विभक्त कर दिया, जिसका दंश झेलना हमारी बाध्यता बन चुकी है । कहीं कुछ तो है ही, जिसने इस भूभाग से लम्बे समय के बाद ही सही, घुसपैठियों की जड़ें जम चुकने के बावज़ूद उन्हें कालान्तर में हमारी ज़मीन छोड़ने पर मज़बूर किया । शायद इसी तासीर पर किसी शायर को कहना पड़ा कि, ‘कुछ बात है के हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा’।
अब बात करें हिन्दू-मुसलमान की । क्योंकि कब-कब क्या-क्या हुआ, कब अफ़गानिस्तान वाला भूभाग अलग हो गया, फ़िर कब बर्मा (आज का म्यांमार) हमारा नहीं रहा, और फ़िर उसी प्रकार पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान और गुलाम कश्मीर से हम कब हाथ धो बैठे, यह सबकुछ कुछ पुराने, और कुछ नए इतिहास का विषय है, जिसपर चर्चा करना इस लेख का विषय नहीं है । किसी ब्लाँग में इतिहास-भूगोल की चर्चा हमेशा उबाऊ ही होती है । हमें बात करनी है समाज में निरंतर बढ़ती जा रही उस अ-सहिष्णुता की भावनाओं की, जो हमें निरंतर किसी विदेशी दार्शनिक की उस भविष्यवाणी को चरितार्थ होने की ओर ठेलती हुई सी प्रतीत हो रही हैं, जिसमें उसने एक-दो दशक में ही भारत के कम से कम बीस टुकड़े होने की कल्पना की थी । आज पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक अलगाववाद की भावना जिस तेज़ी के साथ जोर पकड़ती जा रही है, उससे तो यही संकेत मिल रहे हैं, कि देर-सवेर कहीं हमें इन तत्वों के आगे घुटने तो नहीं टेक देने पड़ेंगे? उसपर कोढ़ में खाज की तरह इस्लामिक और भगवा आतंकवाद का नारा एक अलग प्रकार के सिरदर्द का कारण बनता जा रहा है । हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्ष के वे ढेर सारे लोग, जिसमें बुद्धिजीवी और आमजन दोनों प्रकार के लोग और ज़मातें हैं, जो कभी अ-सहिष्णुता और कट्टरवाद को कुछ सिरफ़िरे लोगों की सोच होने की दलीलें दिया करते थे, उनके विगत कुछ वर्षों में बदलते तेवर देखकर हैरानी होती है । कट्टरवाद अब कुछ गिनती के हिन्दू-मुस्लिम संगठनों की सीमा से बाहर होकर सड़कों पर आता जा रहा है । समाज पहले भी धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर दो खेमों में बंटा हुआ था, परन्तु एक अव्यक्त सी मर्यादा दोनों को कहीं न कहीं जोड़ती थी । उस मर्यादा की दीवारें तेज़ी से ढहती जा रही हैं, यह चिन्ता का विषय है । जहां जिसकी आबादी अधिक है, वहां स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यक आबादी अल्प-संख्यक पर भारी पड़ती है, यह एक स्वाभाविक मनोविज्ञान है । हर ऐसी जगह पर अल्पसंख्यक आबादी को कुछ समझौते अपनी स्वच्छन्दता के साथ करते हुए बहुसंख्यक समाज के साथ एडजस्ट करना पड़ता है, ऐसा शुरू से ही होता आया है । वोट की राजनीति अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से समाज को आपस में लड़ाते आई है ।
परन्तु आज की असहिष्णुता के तेवर घातक इसलिये हैं, क्योंकि इसका अंजाम घातक है । शायद बहुसंख्यक समाज इस खतरे से कहीं न कहीं जानबूझकर आंख चुराता हुआ सा प्रतीत हो रहा है । कश्मीर के मुसलमान शुरू से ही भारत के अन्य मुसलमानों से अलग श्रेणी के रहे, क्योंकि इस श्रेणी को हमने ही गढ़ा, और उसे परवान चढ़ाया । आर्थिक पैकेज दे-देकर हमने वहां के मुसलमानों को काहिल, मुफ़्तखोर, मुंहज़ोर और बिगड़ैल बना दिया, जैसे किसी रईसज़ादे के बच्चे होते हैं । ऐसे विधान बनाकर दे दिये कि इधर का कोई वहां जाकर न तो बस सकता है, न ही कोई धंधा रोज़गार जमा सकता है । लिहाज़ा वहां के मुसलमान पूरी तरह अपनी मर्ज़ी के मालिक और पाकिस्तान से रोटी-बेटी का रिश्ता होने के कारण उसके क़रीबी बनते चले गए । इसके विपरीत इधर के मुसलमानों के लिये हमने कुछ भी खास नहीं किया ताक़ि वह भी मुख्यधारा के साथ मिलकर अपने को विकसित कर सकें । कुछ गिने-चुने लोगों का विकास हुआ, और आज वही लोग उस समाज के अगुआ बने हुए हैं । सवाल यह है कि मुसलमान के नाम पर यदि हम उन्हें भी कश्मीरी मुसलमान और बाहरी इस्लामिक कट्टरवादियों आतंकवादियों की श्रेणी में रखकर देखते हैं, तो फ़िर वहीं यह सवाल भी पैदा होता है कि आखिर हम चाहते क्या हैं? मुसलमान क़ौम से छुटकारा? कैसे? उनसे आर-पार की लड़ाई लड़ के? फ़िर क्या होगा? आज जो मुस्लिम आबादी भारत में है, सबको पता है कि पाकिस्तान की पूरी आबादी से भी अधिक है । तब फ़िर अपनी ज़मीन के और टुकड़े करने के लिये भी हमें मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिये । क्योंकि हिन्दू मुस्लिम से अलग हो जायं, या मुस्लिम हिन्दू से, बात बिल्कुल बराबर है , कोई फ़र्क़ नहीं । यदि मारकर किसी सम्प्रदाय को समाप्त किया जा सकता, तो पहला मौक़ा आक्रमणकारी मुग़लों के हाथ आया था । क्यों नहीं वे हिन्दुओं का खात्मा कर पूरे भारत को मुस्लिम आबादी में तब्दील कर पाए? मार-काट मचाकर भी जब समाप्त नहीं कर पाए, तो धर्मांतरण का सहारा लेना पड़ा, फ़िर भी शत-प्रतिशत हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बना पाए । आज वही आबादी हिन्दू-मुस्लिम दो खेमों में विभक्त है । जब मुसलमान हिन्दुओं को समाप्त नहीं कर पाए, तो हिन्दू भी कभी मुसलमानों को समाप्त नहीं कर सकते । एक ही विकल्प निकलेगा इस लड़ाई का, कि ज़मीन के टुकड़े कीजिये, तथा एक और देश की सीमा तय कर लीजिये । इस विकल्प से भी बात बनती कहां है? पाकिस्तान बनने के बाद भी तमाम मुसलमानों ने अपनी धरती, जहां उनके पुरखे पैदा हुए थे, वहीं मर जाना पसन्द किया, उधर गए नहीं । उधर के कुछ हिन्दुओं ने भी ऐसा ही किया था, जो आज वहां अल्पसंख्यक हैं ।
ले-देकर बात वहीं अटकती है कि इस झगड़े को बढ़ावा देकर, दोनों में से किसी भी कौम द्वारा अपने लोगों में कट्टरवादिता को प्रश्रय देकर कुछ भी हासिल नहीं होने वाला । कुछ लोगों की दुकानदारी ज़रूर चमकती है इन भावनाओं को भड़काकर, जैसे नेता और कुछ तथाकथित हिन्दूवादी खबरची और प्रतिक्रियावादी । जिनको विधानसभाओं और लोकसभा या फ़िर अपनी स्थानीय निकाय की सीट पक्की करनी होती है, या फ़िर तीखे तेवरों वाली पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान स्थापित करनी होती है, या फ़िर थोडी दूरी पर अपने गुट का धार्मिक या राजनीतिक नेता बनने की सम्भावना दिखती है । मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि हिन्दू हों या मुसलमान, इस विचारधारा के लोग ही समाज के असली दुश्मन और अलगाववाद को प्रश्रय देने वाले लोग होते हैं । हम दूसरे किसी भी देश से अपनी तुलना करने की स्थिति में कभी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि किसी भी देश की आबादी जाति-धर्म और पंथ की इतनी विभिन्नताओं के साथ आबाद नहीं है । हमारे लिये एक और एकमात्र रास्ता है कि आज विज्ञान और टेक्नाँलाँजी के ज़माने में विकास के सारे सुख प्राप्त करने हेतु, सभी जाति पंथ और मजहब एक होकर आतंकवाद, अलगाववाद और वह कोई भी ताक़त जो हमारे विकास का रोड़ा बनती हो, उसको एकजुट होकर पूरी ताक़त से कुचल दें । इसके लिये हमें सम्प्रदायवाद की संकीर्णता से ऊपर उठना ही होगा, क्योंकि और कोई चारा नहीं है । हिन्दू हो या मुस्लिम, कोई इस देश के टुकड़े होता देखना कभी पसन्द नहीं करेगा, सिवाय विदेशी खर्चों पर पल रहे भाड़े के टट्टुओं के । इनकी तो न कोई जाति है, न मजहब, न ही आमजन के जीने मरने से कोई वास्ता । इनके दमन के लिये हम सब का कर्त्तव्य बनता है कि अपने जवानों, चाहे किसी भी फ़ोर्स से सम्बन्धित हों, उनको नैतिक समर्थन देने के लिये हमेशा आगे रहें । नेताओं की बातों को तौलें । यदि वे देश और समाज के हित में काम करते हैं, तो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उन्हें समर्थन दें । यदि उनकी किसी गतिविधि में उनका दलगत या व्यक्तिगत स्वार्थ दिखता हो, तो उन्हें कभी बढ़ावा न दें । हम सुधरेंगे, तो समाज और देश दोनों स्वत: सुधर जाएंगे ।
अब बात करें हिन्दू-मुसलमान की । क्योंकि कब-कब क्या-क्या हुआ, कब अफ़गानिस्तान वाला भूभाग अलग हो गया, फ़िर कब बर्मा (आज का म्यांमार) हमारा नहीं रहा, और फ़िर उसी प्रकार पूर्वी-पश्चिमी पाकिस्तान और गुलाम कश्मीर से हम कब हाथ धो बैठे, यह सबकुछ कुछ पुराने, और कुछ नए इतिहास का विषय है, जिसपर चर्चा करना इस लेख का विषय नहीं है । किसी ब्लाँग में इतिहास-भूगोल की चर्चा हमेशा उबाऊ ही होती है । हमें बात करनी है समाज में निरंतर बढ़ती जा रही उस अ-सहिष्णुता की भावनाओं की, जो हमें निरंतर किसी विदेशी दार्शनिक की उस भविष्यवाणी को चरितार्थ होने की ओर ठेलती हुई सी प्रतीत हो रही हैं, जिसमें उसने एक-दो दशक में ही भारत के कम से कम बीस टुकड़े होने की कल्पना की थी । आज पूर्वोत्तर से लेकर कश्मीर तक अलगाववाद की भावना जिस तेज़ी के साथ जोर पकड़ती जा रही है, उससे तो यही संकेत मिल रहे हैं, कि देर-सवेर कहीं हमें इन तत्वों के आगे घुटने तो नहीं टेक देने पड़ेंगे? उसपर कोढ़ में खाज की तरह इस्लामिक और भगवा आतंकवाद का नारा एक अलग प्रकार के सिरदर्द का कारण बनता जा रहा है । हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्ष के वे ढेर सारे लोग, जिसमें बुद्धिजीवी और आमजन दोनों प्रकार के लोग और ज़मातें हैं, जो कभी अ-सहिष्णुता और कट्टरवाद को कुछ सिरफ़िरे लोगों की सोच होने की दलीलें दिया करते थे, उनके विगत कुछ वर्षों में बदलते तेवर देखकर हैरानी होती है । कट्टरवाद अब कुछ गिनती के हिन्दू-मुस्लिम संगठनों की सीमा से बाहर होकर सड़कों पर आता जा रहा है । समाज पहले भी धर्म और सम्प्रदाय के आधार पर दो खेमों में बंटा हुआ था, परन्तु एक अव्यक्त सी मर्यादा दोनों को कहीं न कहीं जोड़ती थी । उस मर्यादा की दीवारें तेज़ी से ढहती जा रही हैं, यह चिन्ता का विषय है । जहां जिसकी आबादी अधिक है, वहां स्वाभाविक रूप से बहुसंख्यक आबादी अल्प-संख्यक पर भारी पड़ती है, यह एक स्वाभाविक मनोविज्ञान है । हर ऐसी जगह पर अल्पसंख्यक आबादी को कुछ समझौते अपनी स्वच्छन्दता के साथ करते हुए बहुसंख्यक समाज के साथ एडजस्ट करना पड़ता है, ऐसा शुरू से ही होता आया है । वोट की राजनीति अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से समाज को आपस में लड़ाते आई है ।
परन्तु आज की असहिष्णुता के तेवर घातक इसलिये हैं, क्योंकि इसका अंजाम घातक है । शायद बहुसंख्यक समाज इस खतरे से कहीं न कहीं जानबूझकर आंख चुराता हुआ सा प्रतीत हो रहा है । कश्मीर के मुसलमान शुरू से ही भारत के अन्य मुसलमानों से अलग श्रेणी के रहे, क्योंकि इस श्रेणी को हमने ही गढ़ा, और उसे परवान चढ़ाया । आर्थिक पैकेज दे-देकर हमने वहां के मुसलमानों को काहिल, मुफ़्तखोर, मुंहज़ोर और बिगड़ैल बना दिया, जैसे किसी रईसज़ादे के बच्चे होते हैं । ऐसे विधान बनाकर दे दिये कि इधर का कोई वहां जाकर न तो बस सकता है, न ही कोई धंधा रोज़गार जमा सकता है । लिहाज़ा वहां के मुसलमान पूरी तरह अपनी मर्ज़ी के मालिक और पाकिस्तान से रोटी-बेटी का रिश्ता होने के कारण उसके क़रीबी बनते चले गए । इसके विपरीत इधर के मुसलमानों के लिये हमने कुछ भी खास नहीं किया ताक़ि वह भी मुख्यधारा के साथ मिलकर अपने को विकसित कर सकें । कुछ गिने-चुने लोगों का विकास हुआ, और आज वही लोग उस समाज के अगुआ बने हुए हैं । सवाल यह है कि मुसलमान के नाम पर यदि हम उन्हें भी कश्मीरी मुसलमान और बाहरी इस्लामिक कट्टरवादियों आतंकवादियों की श्रेणी में रखकर देखते हैं, तो फ़िर वहीं यह सवाल भी पैदा होता है कि आखिर हम चाहते क्या हैं? मुसलमान क़ौम से छुटकारा? कैसे? उनसे आर-पार की लड़ाई लड़ के? फ़िर क्या होगा? आज जो मुस्लिम आबादी भारत में है, सबको पता है कि पाकिस्तान की पूरी आबादी से भी अधिक है । तब फ़िर अपनी ज़मीन के और टुकड़े करने के लिये भी हमें मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिये । क्योंकि हिन्दू मुस्लिम से अलग हो जायं, या मुस्लिम हिन्दू से, बात बिल्कुल बराबर है , कोई फ़र्क़ नहीं । यदि मारकर किसी सम्प्रदाय को समाप्त किया जा सकता, तो पहला मौक़ा आक्रमणकारी मुग़लों के हाथ आया था । क्यों नहीं वे हिन्दुओं का खात्मा कर पूरे भारत को मुस्लिम आबादी में तब्दील कर पाए? मार-काट मचाकर भी जब समाप्त नहीं कर पाए, तो धर्मांतरण का सहारा लेना पड़ा, फ़िर भी शत-प्रतिशत हिन्दुओं को मुसलमान नहीं बना पाए । आज वही आबादी हिन्दू-मुस्लिम दो खेमों में विभक्त है । जब मुसलमान हिन्दुओं को समाप्त नहीं कर पाए, तो हिन्दू भी कभी मुसलमानों को समाप्त नहीं कर सकते । एक ही विकल्प निकलेगा इस लड़ाई का, कि ज़मीन के टुकड़े कीजिये, तथा एक और देश की सीमा तय कर लीजिये । इस विकल्प से भी बात बनती कहां है? पाकिस्तान बनने के बाद भी तमाम मुसलमानों ने अपनी धरती, जहां उनके पुरखे पैदा हुए थे, वहीं मर जाना पसन्द किया, उधर गए नहीं । उधर के कुछ हिन्दुओं ने भी ऐसा ही किया था, जो आज वहां अल्पसंख्यक हैं ।
ले-देकर बात वहीं अटकती है कि इस झगड़े को बढ़ावा देकर, दोनों में से किसी भी कौम द्वारा अपने लोगों में कट्टरवादिता को प्रश्रय देकर कुछ भी हासिल नहीं होने वाला । कुछ लोगों की दुकानदारी ज़रूर चमकती है इन भावनाओं को भड़काकर, जैसे नेता और कुछ तथाकथित हिन्दूवादी खबरची और प्रतिक्रियावादी । जिनको विधानसभाओं और लोकसभा या फ़िर अपनी स्थानीय निकाय की सीट पक्की करनी होती है, या फ़िर तीखे तेवरों वाली पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान स्थापित करनी होती है, या फ़िर थोडी दूरी पर अपने गुट का धार्मिक या राजनीतिक नेता बनने की सम्भावना दिखती है । मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि हिन्दू हों या मुसलमान, इस विचारधारा के लोग ही समाज के असली दुश्मन और अलगाववाद को प्रश्रय देने वाले लोग होते हैं । हम दूसरे किसी भी देश से अपनी तुलना करने की स्थिति में कभी नहीं हो पाएंगे, क्योंकि किसी भी देश की आबादी जाति-धर्म और पंथ की इतनी विभिन्नताओं के साथ आबाद नहीं है । हमारे लिये एक और एकमात्र रास्ता है कि आज विज्ञान और टेक्नाँलाँजी के ज़माने में विकास के सारे सुख प्राप्त करने हेतु, सभी जाति पंथ और मजहब एक होकर आतंकवाद, अलगाववाद और वह कोई भी ताक़त जो हमारे विकास का रोड़ा बनती हो, उसको एकजुट होकर पूरी ताक़त से कुचल दें । इसके लिये हमें सम्प्रदायवाद की संकीर्णता से ऊपर उठना ही होगा, क्योंकि और कोई चारा नहीं है । हिन्दू हो या मुस्लिम, कोई इस देश के टुकड़े होता देखना कभी पसन्द नहीं करेगा, सिवाय विदेशी खर्चों पर पल रहे भाड़े के टट्टुओं के । इनकी तो न कोई जाति है, न मजहब, न ही आमजन के जीने मरने से कोई वास्ता । इनके दमन के लिये हम सब का कर्त्तव्य बनता है कि अपने जवानों, चाहे किसी भी फ़ोर्स से सम्बन्धित हों, उनको नैतिक समर्थन देने के लिये हमेशा आगे रहें । नेताओं की बातों को तौलें । यदि वे देश और समाज के हित में काम करते हैं, तो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उन्हें समर्थन दें । यदि उनकी किसी गतिविधि में उनका दलगत या व्यक्तिगत स्वार्थ दिखता हो, तो उन्हें कभी बढ़ावा न दें । हम सुधरेंगे, तो समाज और देश दोनों स्वत: सुधर जाएंगे ।
रविवार, 26 सितंबर 2010
भगवान श्रीराम को फिर से वनवास????- डॉ0 प्रवीण तोगड़िया

भारत ही नहीं वरन् विश्व का हिन्दू अयोध्या में भगवान् राम की जन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर की सदियों से राह देख रहा है ! भगवान् राम तो लोभ-मोह से परे एक बार वनवास में चले गए थे – तब पिता का सम्मान रखना था उन्हें ! अब फिर से भगवान् राम की जन्मभूमि पर के मंदिर को यानी कि भगवान् राम को ही फिर से वनवास भेजा गया ! 450 वर्ष का अन्याय 4,00,000 हिन्दुओं का बलिदान, कोठारी बन्धुओं के वृद्ध माता-पिता के आंसुओं में से भी धधकती हुई राम मंदिर की आशा, जिन लोगों का राम जन्मभूमि पर इंच भर भी हक नहीं, ऐसे-ऐसे लोगों के साथ हिन्दुओं के सम्मान्य साधु-संतों को बिठा-बिठाकर किए गए समझौते के अनेकानेक प्रयास…….यह सब कुछ सरयू के जल में बह गया क्या ? तब भगवान् राम ने पिता के सम्मान के लिए वनवास भी झेला।
अब हम भी भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च न्यायपालिका के सम्मान के लिए यह दुःख भी झेलेंगे कि अब फिर से भगवान् राम वनवास भेजे गए ! उनके अपने जन्मस्थान पर उनका अपना एक मंदिर हो – मंदिर भगवान् का घर माना जाता है – इसके लिए भगवान् को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करने वालों ने यानी कि बार-बार निरर्थक अर्जियां प्रस्तुत कर देश और हिन्दुओं का अपमान करनेवालों ने तो न्यायपालिका का सम्मान नहीं किया ! लेकिन इस देश का हिन्दू आज दुःखी है ! किसी भी अन्य देश में 85 प्रतिशत से अधिक संख्या में शांति से रहने वालों पर 15 प्रतिशत द्वारा बड़े-बड़े अन्याय नहीं किए जाते – लेकिन भारत में हिन्दू भी अब भगवान् राम के साथ वनवास भेजे गए ! भगवान् राम को और करोड़ों हिन्दुओं की आशा जगी हुई थी कि इतने वर्षों के न्यायालयीन प्रयासों के बाद अब भगवान् राम को उनकी अपनी जन्मभूमि पर एक मंदिर मिलेगा ! लेकिन नहीं !
यह देरी करने में याचिकाकर्ता का क्या मतलब और क्या दुर्हेतु है, यह देश के हिन्दू नहीं समझते ऐसा भी नहीं है, लेकिन भगवान् राम तो अवश्य देख और समझ रहे होंगे कि उनको उनके मंदिर से कौन, क्यों, कब तक वंचित रख रहे हैं !
अयोध्या की परिक्रमा मार्ग में 400 मुस्लिम परिवारों को गरीब आवास योजना में अभी-अभी घर दिए गए – लेकिन अयोध्या में भगवान् राम को उनकी अपनी जन्मभूमि पर मंदिर के लिए कितनी राह देखनी होगी ? और तो और जब दूसरे दिन इसका निर्णय होनेवाला हो उस दिन फिर से भगवान् राम वनवास में ? 1 अक्टूबर को प्रयाग (जिसे कुछ लोग अल्लाहाबाद कहते हैं) के न्यायालय के एक न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो रहे हैं – इसका अर्थ यह है कि फिर से नए सिरे से ट्रायल चलेगी ? फिर अब तक इतने वर्षों से जो सुनवाइयां हुईं, जो निर्णय लिखा भी गया होगा, उसका क्या ? यह देरी करने में याचिकाकर्ता का क्या मतलब और क्या दुर्हेतु है, यह देश के हिन्दू नहीं समझते ऐसा भी नहीं है, लेकिन भगवान् राम तो अवश्य देख और समझ रहे होंगे कि उनको उनके मंदिर से कौन, क्यों, कब तक वंचित रख रहे हैं ! समझौते का बुरका पहनाकर हिन्दुओं को जलील करने की चाल आज तक बहुत चली गयी-न्यायालयों का सम्मान करनेवाले हिन्दू सब दुःख सहते रहेंगे – लेकिन कब तक भगवान् राम अपने मंदिर से वंचित रखे जायेंगे ? क्यों ? इतनी हताशा हिन्दुओं में निर्माण हो, यह किस का प्रयास चल रहा है ?
सेकुलर दिखने की यह फैशन भारत में कैंसर की तरह फैली है – जिनके मन में आज लड्डू फूट रहे होंगे कि वाह-वाह ! देखो हिन्दुओं के राम का मंदिर नहीं बन रहा है ना – वे यह अच्छी तरह समझ लें कि हिन्दू धर्म ने भगवान् राम की न्यायप्रियता देखी है और महाभारत के काल में शिशुपाल और भगवान् श्रीकृष्ण की कहानी भी देखी है ! जो यह सोचकर आज उत्सव मना रहे होंगे कि अब उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश सेवानिवृत्त होंगे, फिर नयी बेंच बनेगी, फिर नए सिरे से सुनवाई होगी और भगवान् राम को मंदिर कभी भी नहीं मिलेगा – ऐसे लोग यह भी समझ लें कि भारत का हिन्दू अब न्यायालयों की परम्परागत देरियों से उकता गया है, दुःखी है, आहत है ! हमारे जैसे लोग संपूर्ण देश में, समाज के हर वर्ग में प्रवास करते रहते हैं – हर वर्ग के हर उम्र के हिन्दुओं से मांग आ रही है कि अब बस ! यदि शाहबानो केस में उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद भारत की संसद अलग कानून बना सकती है, तो भगवान् राम के मंदिर के लिए क्यों नहीं ? क्यों भारत की संसद भगवान् राम को भावी जन्मभूमि पर मंदिर के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर रही है ? भारत की संसद यह भी समझे कि भारत का हिन्दू 6 दशकों से स्वतन्त्र भारत में न्याय की राह देख रहा था – यह न्याय अपने लिए हिन्दू नहीं मांग रहे हैं !
भगवान् राम की अपनी जन्मभूमि पर उनका अपना मंदिर बने, जो पहले से ही था, इसके लिए हिन्दू तरस रहा था – अब हिन्दुओं को और ना तरसाओ, यही मांग भारत का हिन्दू भारत की संसद से कर रहा है ! बहुत देख ली न्यायालयीन प्रक्रियाओं की देरी, बहुत देखी ली झूठ-मूठ की याचिकाएं और बहुत देख लिए राजनीति से प्रेरित समझौते के खोखले प्रयास ! विदेशी बाबर के ढांचे को सम्मान देने वाले सेकुलर भी भारत ने बहुत देख लिए, अब बस ! बस हुआ भगवान् राम का कलियुगी वनवास ! नहीं राह देखनी है हिन्दुओं को न्यायालयीन देरी की – हिन्दू न्यायालयों का सम्मान करते हैं, करते रहेंगे लेकिन बस ! यह मसला भारत की अस्मिता का मसला है।
अब भारत की संसद भगवान् राम का मंदिर बनाने का कानून भगवान् सोमनाथ की तर्ज पर बनाए, यही एक तात्कालिक मांग है ! और सभी राजकीय पक्ष इसमें एक होकर हिन्दुओं का श्रद्धा स्थान और भारत का सम्मान ऐसे भगवान् राम के मंदिर के लिए कानून बनाए और वह भी अब बिना देरी के ! भारत के हिन्दुओं के धर्मसंयम की और परीक्षा अब ना ले कोई, यही भगवान् राम से प्रार्थना है !
डरी हुई लड़कियां !!!!!!!!!!!!!!
यह वाकई चिंता की बात है कि देश के महानगरों और बड़े शहरों की 77 फीसदी लड़कियों को छेड़खानी का डर सताता
रहता है। गैर सरकारी संगठन 'प्लान इंडिया' के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है। इस सर्वे के मुताबिक 69 प्रतिशत लड़कियां शहरों को अपने लिए सुरक्षित नहीं मानतीं। यह राय हर वर्ग की लड़कियों की है, चाहे वह झुग्गी- झोपड़ी में रहती हों, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ती हों या नौकरीपेशा हों।
निश्चय ही यह उन शहरों की कानून-व्यवस्था और सामाजिक वातावरण पर एक कड़ी टिप्पणी है। एक आधुनिक समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वहां महिलाएं अपने को कितना सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करती हैं। इस नजरिए से देखें तो हमारे शहर अब भी आधुनिक मूल्यों से काफी दूर नजर आते हैं। वहां छेड़खानी और यौन अपराधों का होना इस बात का संकेत है कि वहां के समाज में स्त्री-पुरुष संबंध में सहजता अभी नहीं आई है। सामंती समाज में स्त्री-पुरुष का रिश्ता गैर बराबरी का रहा है। इस कारण उनमें आपसी संवाद की गुंजाइश भी बेहद कम रही है। लेकिन ज्यों-ज्यों समाज बदला, स्त्री को हर स्तर पर आगे बढ़ने के मौके मिले। धीरे-धीरे उनके प्रति नजरिए में तब्दीली आई। और इस तरह स्त्री-पुरुष संबंध का तानाबाना भी बहुत कुछ बदला। दोनों का अपरिचय काफी हद तक खत्म हुआ। गांवों-कस्बों की तुलना में शहरों-महानगरों में स्त्री को ज्यादा आजादी मिली, शिक्षा और रोजी-रोजगार के अवसर ज्यादा मिले। लेकिन पुरुष वर्ग की मानसिकता में सामंती मूल्यों के अवशेष अब भी बचे हुए हैं। यौन अपराध कहीं न कहीं उसी की अभिव्यक्ति हैं।
असल में सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी हर जगह एक सी नहीं रही है। उनमें काफी असंतुलन है। यही वजह है दिल्ली जैसे महानगर में एक तरफ तो लिव इन रिलेशन को भी स्वीकार किया जा रहा है, दूसरी ओर ऑनर किलिंग की घटनाएं भी घट रही हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि पुलिस-प्रशासन में भी पुरुषवाद हावी है। महिलाओं के साथ होने वाले किसी भी अपराध को आमतौर पर पुलिस गंभीरता से नहीं लेती या बेहद ढीले-ढाले ढंग से कार्रवाई करती है। इस वजह से यौन अपराधों में सजा दिए जाने की दर बेहद कम है। पुलिस का यह रवैया शरारती तत्वों के हौसले बढ़ाता है। महिलाएं भी यथासंभव सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करके चलती हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि आवाज उठाने से वे मुसीबत में पड़ जाएंगी। सर्वे में 40 फीसदी लड़कियों ने कहा है कि वे अपने साथ छेड़छाड़ को नजरअंदाज करती हैं। महिलाओं के सशक्तीकरण की आज खूब बातें की जा रही हैं। पर जब वे बेखौफ होकर सड़क पर चल भी नहीं सकतीं तो उनके एम्पॉवरमेंट का क्या मतलब है।
रहता है। गैर सरकारी संगठन 'प्लान इंडिया' के एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है। इस सर्वे के मुताबिक 69 प्रतिशत लड़कियां शहरों को अपने लिए सुरक्षित नहीं मानतीं। यह राय हर वर्ग की लड़कियों की है, चाहे वह झुग्गी- झोपड़ी में रहती हों, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ती हों या नौकरीपेशा हों।
निश्चय ही यह उन शहरों की कानून-व्यवस्था और सामाजिक वातावरण पर एक कड़ी टिप्पणी है। एक आधुनिक समाज की पहचान इस बात से भी होती है कि वहां महिलाएं अपने को कितना सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करती हैं। इस नजरिए से देखें तो हमारे शहर अब भी आधुनिक मूल्यों से काफी दूर नजर आते हैं। वहां छेड़खानी और यौन अपराधों का होना इस बात का संकेत है कि वहां के समाज में स्त्री-पुरुष संबंध में सहजता अभी नहीं आई है। सामंती समाज में स्त्री-पुरुष का रिश्ता गैर बराबरी का रहा है। इस कारण उनमें आपसी संवाद की गुंजाइश भी बेहद कम रही है। लेकिन ज्यों-ज्यों समाज बदला, स्त्री को हर स्तर पर आगे बढ़ने के मौके मिले। धीरे-धीरे उनके प्रति नजरिए में तब्दीली आई। और इस तरह स्त्री-पुरुष संबंध का तानाबाना भी बहुत कुछ बदला। दोनों का अपरिचय काफी हद तक खत्म हुआ। गांवों-कस्बों की तुलना में शहरों-महानगरों में स्त्री को ज्यादा आजादी मिली, शिक्षा और रोजी-रोजगार के अवसर ज्यादा मिले। लेकिन पुरुष वर्ग की मानसिकता में सामंती मूल्यों के अवशेष अब भी बचे हुए हैं। यौन अपराध कहीं न कहीं उसी की अभिव्यक्ति हैं।
असल में सामाजिक विकास की प्रक्रिया भी हर जगह एक सी नहीं रही है। उनमें काफी असंतुलन है। यही वजह है दिल्ली जैसे महानगर में एक तरफ तो लिव इन रिलेशन को भी स्वीकार किया जा रहा है, दूसरी ओर ऑनर किलिंग की घटनाएं भी घट रही हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि पुलिस-प्रशासन में भी पुरुषवाद हावी है। महिलाओं के साथ होने वाले किसी भी अपराध को आमतौर पर पुलिस गंभीरता से नहीं लेती या बेहद ढीले-ढाले ढंग से कार्रवाई करती है। इस वजह से यौन अपराधों में सजा दिए जाने की दर बेहद कम है। पुलिस का यह रवैया शरारती तत्वों के हौसले बढ़ाता है। महिलाएं भी यथासंभव सब कुछ चुपचाप बर्दाश्त करके चलती हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि आवाज उठाने से वे मुसीबत में पड़ जाएंगी। सर्वे में 40 फीसदी लड़कियों ने कहा है कि वे अपने साथ छेड़छाड़ को नजरअंदाज करती हैं। महिलाओं के सशक्तीकरण की आज खूब बातें की जा रही हैं। पर जब वे बेखौफ होकर सड़क पर चल भी नहीं सकतीं तो उनके एम्पॉवरमेंट का क्या मतलब है।
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